लोगों की राय

उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

320 पाठक हैं

राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


शंखधर सोच रहा है, अब की फिर कहीं रास्ता भूला, तो सर्वनाश ही हो जाएगा। तब वह समझ जाएगा, मेरा जीवन रोने के लिए बनाया गया है। रोदन–अनंत रोदन ही उसका काम है। अच्छा, कहीं पिताजी मिल गए? उनके सम्मुख वह जा भी सकेगा या नहीं? वह उसे देखकर क्रुद्ध तो न होंगे? जिसे दिल से भुला देने के लिए ही उन्होंने यह तपस्या का व्रत लिया है, उसे सामने देखकर वह प्रसन्न होंगे?

अच्छा, वह उनसे क्या कहेगा? अवश्य ही उनसे घर चलने का अनुरोध करेगा। क्या माता की दारुण दशा पर उन्हें दया न आएगी? क्या जब वह सुनेंगे कि रानी अम्माँ गलकर काँटा हो गई हैं, नानाजी रो रहे हैं, दादीजी दिन-रात रोया करती हैं, तो क्या उनका हृदय द्रवित न हो जाएगा? वह हृदय, जो परदु:ख से पीड़ित होता है, क्या अपने घरवालों के दु:ख से दु:खी न होगा? जब वह नयनों में अश्रुजल भरे उनके चरणों पर गिरकर कहेगा कि अब घर चलिए, तो क्या उन्हें उस पर दया न आएगी? अम्माँ कहती हैं, वह मुझे बहुत प्यार करते थे; क्या अपने प्यारे पुत्र की यह दयनीय दशा देखकर उनका हृदय मोम न हो जाएगा? होगा क्यों नहीं? वह जाएँगे कैसे नहीं? उन्हें पाँव खींचकर ले जाएगा?  अगर वह उसके साथ न आएँगे, तो वह भी लौटकर घर न जाएगा, उन्हीं के साथ रहेगा, उनकी ही सेवा में रहकर अपना जीवन सफल करेगा।

इन्हीं कल्पनाओं में डूबा हुआ शंखधर धावा मारे जा रहा था। रास्ते में जो मिलता, उससे वह पूछता, साईंगंज कितनी दूर है? जवाब मिलता–बस, साईंगंज ही है। लेकिन जब आगेवाली बस्ती में पहुँचकर पूछता–क्या यही साईंगंज है, तो फिर यही जवाब मिला–बस, आगे साईंगंज़ है। आख़िर दोपहर होते-होते उसे दूर से एक मन्दिर का कलश दिखाई दिया! एक चरवाहे से पूछा–यह कौन गाँव है? उसने कहा–साईंगंज। साईंगंज आ गया! वह गाँव, जहाँ उसकी किस्मत का फैसला होने वाला था, जहाँ इस बात का निश्चय होगा कि वह राजा बनकर राज्य करेगा या रंक बनकर भीख माँगेगा।

लेकिन ज़्यों-ज़्यों गाँव निकट आता था, शंखधर के पाँव सुस्त पड़ते जाते थे। उसे यह शंका होने लगी कि वह यहाँ से चले न गए हों। अब उनसे भेंट न होगी। वह इस शंका को कितना ही दिल से निकालना चाहता था, पर वह अपना आसन छोड़ती थी।

अच्छा, अगर उनसे यहाँ भेंट न हुई, तो वह क्या और आगे जा सकेगा? नहीं, अब उससे एक पग भी न चला जाएगा। अगर भेंट होगी, तो यहीं होगी नहीं तो फिर कौन जाने क्या होगा। अच्छा, अगर भेंट हुई और उन्होंने उसे पहचान लिया तो? पहचानकर वह उसकी ओर से मुँह फेर लें तो? तब वह क्या करेगा?  उस दशा में क्या वह उनके पैरों पड़ सकेगा? उनके सामने रो सकेगा, अपनी विपत्ति-कथा कह सकेगा? कभी नहीं। उसका आत्मसम्मान उसकी ज़बान पर मुहर लगा देगा। वह फिर एक शब्द भी मुँह से न निकाल सकेगा। आँसू की एक बूँद भी क्या उसकी आँखों से निकलेगी? वह जबरदस्ती उसे आत्मीयता न जताएगा, ‘मान-न-मान, मैं तेरा मेहमान’ न बनेगा। तो क्या वह इतने निर्दय, इतने निष्ठुर हो जाएँगे? नहीं, वह ऐसे नहीं हो सकते। हाँ, यह हो सकता है कि उन्होंने कर्तव्य का जो आदर्श अपने सामने रखा है और जिस नि:स्वार्थ कर्म के लिए राजपाट को त्याग दिया है, वह उनके मनोभावों के ज़बान पर न आने दे; अपने प्रिये को हृदय से लगाने के लिए विकल होने पर भी वह छाती पर पत्थर की शिला रखकर उसकी ओर से मुँह फेर लें। तो क्या इस दशा में उसका उनके पास जाना, इन्हें इतनी कठिन परीक्षा में डालना, उन्हें आदर्श से हटाने की चेष्टा करना उचित है? कुछ भी हो, इतनी दूर आकर अब उनके दर्शन किए बिना वह न लौटेगा। उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि वह उसे पहचान न सकें। वह अपने मुँह से एक शब्द भी ऐसा न निकालेगा, जिससे उन्हें उसका परिचय मिल सके। वह उसी भाँति दूर से उनके दर्शन करके आपने को कृतार्थ समझेगा, जैसे उनके और भक्त करते हैं।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book