|
उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
|
320 पाठक हैं |
राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
अब राजा साहब के पास जाने का किसी को साहस नहीं होता। मनोरमा को देख-देखकर वह जामे से बाहर हो जाते हैं। अहिल्या भी उनसे कुछ कहते हुए थरथर काँपती है। अपने प्यारों को खोजने के लिए वह तरह-तरह के मनसूबे बाँधा करती है; लेकिन कहे किससे? उसे ऐसा विदित होता है कि ईश्वर ने उसकी भोग-लिप्सा का यह दंड दिया है। यदि वह अपने पति के घर में जाकर इसका प्रायश्चित करे, तो कदाचित् ईश्वर उसका अपराध क्षमा कर दें। उसका डूबता हुआ हृदय इस तिनके के सहारे को ज़ोरों से पकड़े हुए है; लेकिन हाय रे मानव हृदय! इस घोर विपत्ति में भी मान का भूत सिर से नहीं उतरता। जाना तो चाहती है; लेकिन उसके साथ यह शर्त है कि कोई बुलाए। अगर राजा साहब मुंशीजी से इस विषय में कुछ संकेत कर दें, तो उसके लिए अवश्य बुलावा आ जाए; पर राजा साहब से तो कुछ भेंट ही नहीं होती और भेंट भी होती है, तो कुछ कहने की हिम्मत नहीं पड़ती।
इसमें संदेह नहीं कि वह अपने मन की बात मनोरमा से कह देती, तो बहुत आसानी से काम निकल जाता; लेकिन अहिल्या का मन मनोरमा से न पहले कभी मिला था, न अब मिलता था। उससे यह बात कैसे कहती? जो मनोरमा अब गाने-बजाने और सैर-सपाटे में मग्न रहती है, उससे यह अपनी व्यथा कैसे कह सकेगी? वह कहे भी, तो मनोरमा क्यों उसके साथ सहानुभूति करने लगी? वह दिन-के-दिन और रात-की-रात पड़ी रोया करती है। मनोरमा कभी भूलकर भी उसकी बात नहीं पूछती, अपने रंग में मस्त रहती है। वह भला, अहिल्या की पीर क्या जानेगी?
तो मनोरमा सचमुच राग-रंग में मस्त रहती है? हाँ, देखने में तो यही मालूम होता है। लेकिन उसके हृदय पर क्या बीत रही है, यह कौन जान सकता था? वह आशा और नैराश्य, शान्ति और अशान्ति, गम्भीरता और उच्छृंखलता, अनुराग और विराग की एक विचित्र समस्या बन गई है! अगर वह सचमुच हँसती और गाती है, तो उसके मुख की वह कांति कहाँ है, जो चन्द्र को लजाती थी; वह चपलता कहाँ है, जो हिरन को हराती थी! उसके मुख और उसके नेत्रों को ज़रा सूक्ष्म दृष्टि से देखो, तो मालूम होगा कि उसकी हँसी उसका आर्तनाद है और उसका राग प्रेम-मर्मान्तक व्यथा का चिह्न। वह शोक की उस चरम सीमा को पहुँच गई है, जब चिन्ता और वासना दोनों ही का अन्त, लज्जा और आत्मसम्मान का लोप हो जाता है, जब शोक रोग का रूप धारण कर लेता है। मनोरमा ने कच्ची बुद्धि में यौवन जैसा अमूल्य रत्न देकर जो सोने की गुड़िया खरीदी थी, वह अब किसी पक्षी की भाँति उनके हाथों से उड़ गई थी। उसने सोचा था, जीवन का वास्तविक सुख धन और ऐश्वर्य में है; किन्तु अब बहुत दिनों से उसे ज्ञात हो रहा था कि जीवन का वास्तविक सुख कुछ और ही है, और वह उससे आजीवन वंचित रही। सारा जीवन गुड़िया खेलने ही में कट गया और अंत में वह गुड़िया भी हाथ से निकल गई। यह भाग्य-व्यंग्य रोने की वस्तु नहीं, हँसने की वस्तु है। हम उससे कहीं ज़्यादा हँसते हैं, जितना परम आनन्द में हँस सकते हैं। प्रकाश जब हमारी सहन शक्ति से अधिक हो जाता है, तो अन्धकार बन जाता है; क्योंकि हमारी आँखें ही बन्द हो जाती हैं।
|
|||||











