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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
एक दिन अहिल्या का चित्त उद्विग्न हुआ कि वह संकोच और झिझक छोड़कर मनोरमा के पास आ बैठी। मनोरमा के सामने प्रार्थी के रूप में आते हुए उसे जितनी मानसिक वेदना हुई, उसका अनुमान इसी से किया जा सकता है, कि अपने कमरे से यहाँ तक आने में उसे कम-से-कम दो घंटे लगे। कितनी ही बार द्वार तक आकर लौट गयी। जिसकी सदैव अवहेलना की, उसके सामने अब अपनी ग़रज़ लेकर जाने में उसे लज्जा आती थी; लेकिन जब भगवान् ने ही गर्व तोड़ दिया था, तो अब झूठी ऐंठ से क्या हो सकता था?
मनोरमा ने उसे देखकर कहा–क्या रो रही थी अहिल्या? यों कब तक रोती रहोगी?
अहिल्या ने दीन भाव से कहा–जब तक भगवान् रुलावें!
कहने को तो अहिल्या ने यह कहा; पर इस प्रश्न से उसका गर्व जाग उठा और वह पछतायी कि यहाँ नाहक आयी। उसका मुख तेज़ से आरक्त हो गया।
मनोरमा ने उपेक्षा भाव से कहा–तब तो हँसना चाहिए। जिसमें दया नहीं, उसके सामने रोकर अपना दीदा क्यों खोती हो? भगवान् अपने घर का भगवान् होगा। कोई उसके रुलाने से क्यों रोए? मन में एक बार निश्चय कर लो कि अब न रोऊँगी, फिर देखूँ कि कैसे रोना आता है!
अहिल्या से अब जब्त न हो सका, बोली–तुम तो जले पर नमक छिड़कती हो, रानीजी? तुम्हारे जैसा हृदय कहाँ से लाऊँ? और फिर रोता भी वह है, जिस पर पड़ती है। जिस पर पड़ी ही नहीं, वह क्यों रोएगा!
मनोरमा हँसी–वह हँसी, जो या तो मूर्ख ही हँस सकता है या ज्ञानी ही। बोली–अगर भगवान् किसी को रुलाकर ही प्रसन्न होता है, तब तो वह विचित्र ही जीव है। अगर कोई माता या पिता अपनी संतान को रोते देखकर प्रसन्न हो, तो तुम उसे क्या कहोगी–बोली? तुम्हारा जी चाहेगा कि ऐसे प्राणी का मुँह न देखूँ। क्या ईश्वर हमसे और तुमसे भी गया बीता है? आओ, बैठकर गावें। इससे ईश्वर प्रसन्न होगा। वह जो कुछ करता है, सबके भले ही के लिए ही करता है। इसलिए जब वह देखता है कि उसे लोग अपना शत्रु समझते हैं, तो उसे दु:ख होता है। तुम अपने पुत्र को इसीलिए तो ताड़ना देती हो कि अच्छे रास्ते पर चले। अगर तुम्हारा पुत्र इस बात पर तुमसे रूठ जाए और तुम्हें अपना शत्रु समझने लगे, तो तुम्हें कितना दु:ख होगा? आओ, तुम्हें एक भैरवी सुनाऊँ। देखो, मैं कैसा अच्छा गाती हूँ!
अहिल्या ने गाना सुनने के प्रस्ताव को अनसुना करके कहा–माता-पिता संतान को इसीलिए तो ताड़ना देते हैं कि वह बुरी आदतें छोड़ दें, अपने बुरे कामों पर लज्जित हों और उसका प्रायश्चित करें? हमें भी जब ईश्वर ताड़ना देता है, तो उसकी भी यही इच्छा होती है। विपत्ति ताड़ना ही तो है। मैं भी प्रायश्चित्त करना चाहती हूँ और आपसे उसके लिए सहायता माँगने आयी हूँ। मुझे अनुभव हो रहा है कि यह सारी विडम्बना मेरे विलास-प्रेम का फल है, और मैं इसका प्रायश्चित्त करना चाहती हूँ। मेरा मन कहता है कि यहाँ से निकलकर मैं अपना मनोरथ पा जाऊँगी। यह सारा दंड मेरी विलासांधता का है। आप जाकर अम्माँजी से कह दीजिए, मुझे बुला लें। इस घर में आकर मैं सुख खो बैठी, और इस घर से निकलकर ही उसे पाऊँगी।
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