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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
मनोरमा को ऐसा मालूम हुआ, मानो उसकी आँखें खुल गईं। क्या वह भी इस घर से निकलकर सच्चे आनन्द का अनुभव करेगी? क्या उसे भी ऐश्वर्य-प्रेम का दंड भोगना पड़ रहा है? क्या वह सरी अंतर्वेदना इसी विलास-प्रेम के कारण है?
उसने कहा–अच्छा, अहिल्या, मैं आज ही जाती हूँ।
इसके चौथे दिन मुंशी वज्रधर ने राजा साहब के पास रुखसती का संदेशा भेजा। राजा साहब इलाके पर थे। संदेशा पाते ही जगदीशपुर आये। अहिल्या का कलेजा धक-धक करने लगा कि राजा साहब कहीं आ न जाएँ। इधर-उधर छिपती-फिरती थी कि उनका सामना न हो जाए। उसे मालूम होता था कि राजा साहब ने रुखसती मंजूर कर ली है; पर अब जाने के लिए वह बहुत उत्सुक न थी। यहाँ से जाना तो चाहती थी; पर जाते दु:ख होता था। यहाँ आये उसे चौदह साल हो गए। वह इसी घर को अपना घर समझने लगी थी। ससुराल उसके लिए बिरानी जगह थी। कहीं निर्मला ने कोई बात कह दी, तो वह क्या करेगी? जिस घर से मान करके निकली थी, वहीं अब विवश होकर जाना पड़ रहा था। इन बातों को सोचते-सोचते आख़िर उसका दिल इतना घबराया कि वह राजा साहब के पास जाकर बोली–आप मुझे क्यों बिदा करते हैं? मैं नहीं जाना चाहती।
राजा साहब ने हँसकर कहा–कोई लड़की ऐसा भी है, जो खुशी से ससुराल जाती हो? और कौन पिता ऐसा है, जो लड़की को खुशी से विदा करता हो? मैं कब चाहता हूँ कि तुम जाओ, लेकिन मुंशी वज्रधर की आज्ञा है, और यह मुझे शिरोधार्य करनी पड़ेगी। वह लड़के के बाप हैं, मैं लड़की का बाप हूँ; मेरी और उनकी क्या बराबरी? और बेटी, मेरे दिल में भी अरमान हैं, उसके पूरा करने का और कौन अवसर आएगा? शंखधर होता, तो उसके विवाह में वह अरमान पूरा होता। अब वह तुम्हारे गौने में पूरा होगा।
अहिल्या इसका क्या जवाब देती?
दूसरे दिन से राजा साहब ने बिदाई की तैयारियाँ करनी शुरू कर दीं। सारे इलाके के सुनार पकड़ बुलाए और गहने बनने लगे। इलाके ही के दर्ज़ी कपड़े सीने लगे। हलवाइयों के कढ़ाह चढ़ गए और पकवान बनने लगे। घर की सफाई और रँगाई होने लगी। राजाओं, रईसों और अफ़सरों को निमंत्रण भेजे जाने लगे। सारे शहर की वेश्याओं को बयाने दे दिये गए। बिजली की रोशनी का इंतजाम होने लगा। ऐसा मालूम होता था, मानो किसी बड़ी बरात के स्वागत और सत्कार की तैयारी हो रही है। अहिल्या यह सामान देख-देखकर दिल में झुँझलाती और शर्माती थी। सोचती–कहाँ से कहाँ मैंने यह विपत्ति मोल ले ली। अब इस बुढ़ापे में मेरा गौना! मैं मरने की राह देख रही हूँ; यहाँ गौने की तैयारी हो रही है। कौन जाने, यह अंतिम बिदाई ही हो। राजा साहब ऐसे व्यस्त थे कि किसी से बातें करने की भी फुरसत उन्हें न मिली थी। कहीं सुनारों के पास बैठे अच्छी नक्काशी करने की ताक़ीद कर रहे हैं। कहीं जौहरियों के पास बैठे ज़वाहरात परख रहे हैं। उनके अरमानों का वारापार ही न था। मन की मिठाई घी शक्कर की मिठाई से कम स्वादिष्ट नहीं होती।
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