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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....

४४

शंखधर को होश आया, तो अपने को मंदिर के बरामदे में चक्रधर की गोद में पड़ा हुआ पाया। चक्रधर चिंतित नेत्रों से उसके मुँह की ओर ताक रहे थे। गाँव के कई आदमी आस-पास खड़े पंखा झल रहे थे। आह! आज कितने दिनों के बाद शंखधर को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वह पिता की गोद में लेटा हुआ है! आकाश के निवासियों, तुम पुष्प की वर्षा क्यों नहीं करते?

शंखधर ने फिर आँखें बन्दकर लीं। उसकी चिर सन्तप्त आत्मा एक अलौकिक शीतलता, एक अपूर्व तृप्ति, एक स्वर्गीय आनन्द का अनुभव कर रही थी। इस अपार सुख को वह इतनी जल्द न छोड़ना चाहता था। उसे अपनी वियोगिनी माता की याद आयी। वह उस दिन का स्वप्न देखने लगा, जब वह अपनी माता को भी इस परम आनन्द का अनुभव कराएगा, उसका जीवन सफल करेगा।

चक्रधर ने स्नेहमधुर शब्द में पूछा–क्यों बेटा, अब कैसी तबीयत है?

कितने स्नेहमधुर शब्द थे। किसी के कानों ने कभी इतने कोमल शब्द सुने हैं? भगवान् इन्द्र भी आकर उससे बोलते, तो क्या वह इतना गौरवान्वित हो सकता था?

‘क्यों बेटा, कैसी तबीयत है’–वह इसका क्या जवाब दे? अगर कहता है–अब मैं अच्छा हूँ, तो इस सुख से वंचित होना पड़ेगा। उसने कोई उत्तर नहीं दिया।
देना भी चाहता, तो उसके मुँह से शब्द न निकलते। उसका जी चाहा, इन चरणों पर सिर रखकर खूब रोए। इससे बढ़कर और किसी सुख की वह कल्पना ही न कर सकता था। संसार की कोई वस्तु कभी इतनी सुन्दर थी? वायु और प्रकाश, वृक्ष और वन, पृथ्वी और पर्वत कभी इतने प्यारे न लगते थे। उसकी छटा ही कुछ और हो गई थी, उनमें कितना वात्सल्य था, कितनी आत्मीयता।

चक्रधर ने फिर पूछा–क्यों बेटा कैसी तबीयत है?

शंखधर ने कातर स्वर में कहा–अब तो अच्छा हूँ। आप ही का नाम बाबा भगवानदास है?

चक्रधर–हाँ, मुझी को भगवानदास कहते हैं।

शंखधर–मैं आप ही के दर्शनों के लिए आया हूँ। बहुत दूर से आया हूँ। मैंने बेंदों में आपकी ख़बर पायी। वहाँ मालूम हुआ कि आप साईंगंज चले गए हैं। वहाँ से साईंगंज चला। सारी रात चलता रहा; पर साईंगंज न मिला। एक दूसरे गाँव में जा पहुँचा, वह जो पर्वत के ऊपर बसा हुआ। वहाँ मालूम हुआ कि मैं रास्ता भूल गया था। उसी वक़्त इधर चला।

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