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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
चक्रधर–रात को कहीं ठहरे नहीं?
शंखधर–यही भय था कि शायद आप कहीं और आगे न बढ़ जाएँ?
चक्रधर–कुछ भोजन भी न किया होगा?
शंखधर–भोजन की तो ऐसी इच्छा न थी। आपके दर्शन हुए, मैं कृतार्थ हो गया। अब मेरे संकट कट जाएँगे। मैं आपका यश सुनकर आया हूँ। आप ही मेरा उद्धार कर सकते हैं।
चक्रधर–बेटा, संकट काटनेवाला ईश्वर है, मैं तो उनका क्षुद्र सेवक हूँ; लेकिन पहले कुछ भोजन कर लो और आराम से सो रहो। मुझे कई रोगियों को देखने जाना है। मैं शाम को लौटूँगा, तो तुमसे बातें होंगी। क्या कहूँ, मेरे कारण तुम्हें इतना कष्ट उठाना पड़ा।
शंखधर ने मन में कहा–इस परम आनन्द के लिए मैं क्या नहीं कर सकता था! अगर मुझे मालूम हो जाता कि अग्नि-कुंड में जाने से आपके दर्शन होंगे, तो क्या मैं एक क्षण का भी विलम्ब करता? कदापि नहीं। प्रकट में उसने कहा–मुझे तो स्वर्ग-यात्रा-सी मालूम होती थी। भूख, प्यास, थकान कुछ भी नहीं थी।
चक्रधर का चित्त अस्थिर हो गया। उस युवक के रूप और वाणी में न जाने कौन-सी बात थी, जो उनके मन में उससे बातचीत की प्रबल इच्छा हो रही थी। रोगियों को देखने न जाना चाहते थे; मन बहाना खोजने लगा। रोगियों को दवा दे ही आया हूँ, उनकी चेष्टा भी कुछ ऐसी चिन्ताजनक नहीं। जाना व्यर्थ है। ज़रा पूछना चाहिए कि यह युवक कौन है? क्यों मुझसे मिलने के लिए उत्सुक है? कितना सुशील बालक है! इसकी वाणी में कितना विनय है और स्वरूप तो देवकुमारों का-सा है। किसी उच्च कुल का युवक है।
लेकिन फिर उन्होंने सोचा–मेरे न जाने से रोगियों की कितनी निराशा होगी! कौन जाने उनकी दशा बिगड़ गई हो। जाना ही चाहिए। तब तक यह बालक भी तो आराम कर लेगा! बेचारा सारी रात चलता रहा। मैं जानता, तो बेंदों में टिक गया होता।
एक आदमी पानी लाया। शंखधर ने मुँह-हाथ धोया और चाहता था कि खाली पेट पानी पी लें, लेकिन चक्रधर ने मना किया–हाँ-हाँ, यह क्या? अभी पानी न पियो। रात भर कुछ खाया नहीं और पानी पीने लगे। आओ कुछ भोजन कर लो।
शंखधर–बड़ी प्यास लगी है।
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