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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
चक्रधर–पानी कहीं भागा तो नहीं जाता। कुछ खाकर पीना, और वह भी इतना नहीं कि पेट में पानी डोलने लगे।
शंखधर–दो ही घूँट पी लूँ। नहीं रहा जाता।
चक्रधर ने आकर उसके हाथ से लोटा छीन लिया और कठोर स्वर में कहा–अभी तुम एक बूँद भी पानी नहीं पी सकते। क्या जान देने पर उतारू हो गए हो?
शंखधर को इस भर्त्सना में जो आनन्द मिल रहा था, वह कभी माता की प्रेम भरी बातों में भी न मिला था। पाँच वर्ष हुए, जब से वह अपने मन की करता आया है। वह जो पाता है, खाता है; जब चाहता है, पानी पीता है, जहाँ जगह पाता है, पड़ रहता है। किसी को इसकी कुछ परवाह नहीं होती। लोटा हाथ से न छीना गया होता, तो वह बिना दो चार घुड़कियाँ खाए न मानता।
मंदिर के पीछे छोटा-सा बाग और कुआँ था। वहीं एक वृक्ष के नीचे चक्रधर की रसोई बनी थी। चक्रधर अपना भोजने आप पकाते थे बर्तन भी आप ही धोते थे, पानी भी खुद खींचते थे। शंखधर उनके साथ भोजन करने गया, तो देखा कि रसोई में पूरी, मिठाई, दूध, दही सब कुछ है। उसकी राल टपकने लगी। इन पदार्थों का स्वाद चखे हुए उसे एक युग बीत गया था; मगर उसे कितना आश्चर्य हुआ, जब उसने देखा कि ये सारे पदार्थ उसी के लिए मँगवाए गए हैं। चक्रधर ने उसके लिए तो खाना एक पत्तल में रख दिया और आप कुछ मोटी रोटियाँ और भाजी लेकर, बैठे, जो खुद उन्होंने बनाई थीं।
शंखधर ने कहा–आप तो सब मुझी को दिए जाते हैं, अपने लिए कुछ रखा ही नहीं?
चक्रधर–मेरे लिए तो यह रोटियाँ हैं। मेरा भोजन यही है।
शंखधर–तो फिर मुझे भी रोटियाँ ही दीजिए।
चक्रधर–मैं तो बेटा, रोटियों के सिवा और कुछ नहीं खाता। मेरी पाचन-शक्ति अच्छी नहीं है। दिन में एक बार खा लिया करता हूँ।
शंखधर–मेरा भोजन तो थोड़ा-सत्तू या चबेना हैं। मैंने बरसों से इन चीज़ों की सूरत तक नहीं देखी। अगर आप न खाएँगे, तो मैं भी न खाऊँगा।
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