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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
आख़िर शंखधर के आग्रह से चक्रधर को अपना नियम तोड़ना पड़ा। सोलह वर्षों का पाला हुआ नियम, जिसे बड़े-बड़े रईसों और राजाओं का भक्तिमय आग्रह भी न तोड़ सका था, आज इस अपरिचित बालक ने तोड़ दिया। उन्होंने झुँझलाकर कहा–भाई, तुम बड़े ज़िद्दी मालूम होते हो। अच्छा, लो, मैं भी खाता हूँ। अब तो खाओगे, या अब भी नहीं?
उन्होंने सब चीज़ों में से ज़रा-ज़रा-सा निकालकर अपनी पत्तल में रख लिया और बाकी चीज़ें शंखधर के आगे रख दीं। शंखधर ने अब भी भोजन में हाथ नहीं लगाया।
चक्रधर ने पूछा–अब क्या बैठे हो, खाते क्यों नहीं? तुम्हारे मन की बात हो गई? या अब भी कुछ बाकी है?
शंखधर–आपने को केवल उलाहना छुड़ाया है। लाइए, मैं परस दूँ।
चक्रधर–अगर तुम इस तरह जिद करोगे, तो मैं तुम्हारी दवा न करूँगा। तुम्हें अपने साथ रखूँगा भी नहीं।
शंखधर–मुझे क्या, न दवा कीजिएगा, तो यही पड़ा-पड़ा मर जाऊँगा। कौन कोई रोनेवाला बैठा हुआ है?
यह कहते-कहते शंखधर की आँखें सज़ल हो गईं। चक्रधर ने विकल होकर कहा–अच्छा लाओ, तुम्हीं अपने हाथ से दे दो। अपशब्द क्यों मुँह से निकालते हो? लाओ कितना देते हो? अब से मैं तुम्हें अलग भोजन मँगवा दिया करूँगा।
शंखधर ने सभी चीज़ों में से आधी से अधिक उनके सामने रख दीं और आप एक पंखा लेकर उन्हें झलने लगा। चक्रधर ने वात्सल्यपूर्ण कठोरता से कहा–मालूम होता है, आज तुम मुझे बीमार करोगे। भला, इतनी चीज़ें मैं खा सकूँगा?
शंखधर–इसीलिए तो मैंने थोड़ी-थोड़ी दी हैं।
चक्रधर–यह थोड़ी-थोड़ी हैं। तो क्या तुम सब-की-सब मेरे ही पेट में ठूँस देना चाहते हो? अब भी बैठोगे या नहीं? मुझे पंखे की ज़रूरत नहीं।
शंखधर–आप खाएँ, मैं पीछे से खा लूँगा।
चक्रधर–भाई, तुम विचित्र जीव हो। तीन दिन के भूखे हो और मुझसे कहते हो, आप खाइए, मैं फिर खा लूँगा।
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