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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
चक्रधर–मैं तो आपकी जूठन खाऊँगा।
उसकी आँखें फिर सज़ल हो गईं! चक्रधर ने तिरस्कार के भाव से कहा–क्यों भाई, मेरा जूठन क्यों खाओगे? अब तो सब बातें तुम्हरे ही मन की हो रही हैं।
शंखधर–मेरी बहुत दिनों से यही आकांक्षा थी। जब से आपकी कीर्ति सुनी, तभी से यह अवसर खोज रहा था।
चक्रधर–तुम न आप खाओगे, न मुझे खाने दोगे।
शंखधर–मैं तो आपका जूठन ही खाऊँगा।
चक्रधर को फिर हार माननी पड़ी। वह एकान्तवासी, संयमी, व्रतधारी, योगी आज इस अपरिचित दीन बालक के दुराग्रहों को किसी भाँति न टाल सकता था।
शंखधर को आज खड़े होकर पंखा झलने में तो आनन्द, जो आत्मोल्लास, जो गर्व हो रहा था, उसका कौन अनुमान कर सकता है। इस आनन्द के सामने वह त्रिलोक के राज्य पर भी लात मार सकता था। आज उसे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि अपने पूज्य पिता की कुछ सेवा कर सके। कठिन तपस्या के बाद आज उसे यह वरदान मिला है। उससे बढ़कर सुखी और कौन हो सकता है! आज अपना जीवन सार्थक मालूम हो रहा है–वह जीवन, जिसका अब तक कोई उद्देश्य न था। आनन्द के आँसू उसकी आँखों से बहने लगे।
चक्रधर जब भोजन करके उठ गए तो उसने उसी पत्तल में अपनी पत्तल की चीज़ें डाल लीं और भोजन करने बैठा। ओह! इस भोजन में कितना स्वाद था! क्या सुधा में इतना स्वाद हो सकता है? उसने आज से कई साल पहले उत्तम-से-उत्तम पदार्थ खाए थे, लेकिन उनमें यह अलौकिक स्वाद कहाँ था?
चक्रधर हाथ-मुँह धोकर गद्गद कंठ से बोले–तुमने आज मेरे दो नियम भंग कर दिए। बिना जाने बूझे किसी को मेहमान बना लेने का यही फल होता है। अब मैं आज कहीं न जाऊँगा। तुम भोजन कर लो और मुझसे जो कुछ कहना हो, कहो। मैं ऐसे जिद्दी लड़के को अपने साथ और न रखूँगा। तुम्हारा घर कहाँ हैं? यहाँ से कितनी दूर हैं?
शंखधर–मेरे तो कोई घर ही नहीं।
चक्रधर–माता-पिता तो होंगे? वह किस गाँव में रहते हैं?
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