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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
शंखधर–यह मुझे कुछ नहीं मालूम। पिताजी तो मेरे बचपन ही में घर से चले गए और माताजी का पाँच साल से मुझे कोई समाचार नहीं मिला।
चक्रधर को ऐसा मालूम हुआ, मानों पृथ्वी नीचे खिसकी जा रही है, मानो वह जल में बहे जा रहे हैं। पिता बचपन ही में घर से चले गए और माताजी का पाँच साल से कुछ समाचार नहीं मिला? भगवान क्या यह वही नन्हा-सा बालक है! वही, जिसे अपने हृदय से निकालने की चेष्टा करते हुए आज १६ वर्षों से अधिक हो गए!
उन्होंने हृदय को सँभालते हुए पूछा–तुम पाँच साल तक कहाँ रहे बेटा, जो घर नहीं गए?
शंखधर–पिताजी को खोजने निकला था और जब तक वह न मिलेंगे, लौटकर घर न जाऊँगा।
चक्रधर को ऐसा मालूम हुआ, मानों पृथ्वी डगमगा रही है, मानों समस्त ब्रह्मांड एक प्रलयकारी भूचाल से आन्दोलित हो रहा है। वह सायबान के स्तम्भ के सहारे बैठ गए और एक ऐसे स्वर में बोले, जो आशा और भय के वेगों को दबाने के कारण क्षीण हो गया था। यह प्रश्न न था, बल्कि एक जानी हुई बात का समर्थन मात्र था। तुम्हारा नाम क्या है बेटा? इस प्रश्न का उत्तर क्या वही होगा, ऐसा एक ही बालक है जिसे उसका बाप बचपन में छोड़कर चला गया हो? क्या ऐसा एक ही किशोर है, जो अपने बाप को खोजने निकला हो? यदि उसका उत्तर वही हुआ, जिसका उन्हें भय था, तो वह क्या करेंगे? उनके सामने एक कठिन समस्या उपस्थित हो गई। वह धड़कते हुए हृदय से उत्तर की ओर कान लगाए थे, जैसे कोई अपराधी अपना कर्म-दंड सुनने के लिए न्यायाधीश की ओर कान लगाए खड़ा हो।
शंखधर ने जवाब दिया–मेरा तो नाम शंखधरसिंह है।
चक्रधर–और तुम्हारे पिता का क्या नाम है?
शंखधर–मुंशी चक्रधर कहते हैं।
चक्रधर–घर कहाँ है?
शंखधर–जगदीशपुर!
सर्वनाश! चक्रधर को ऐसा ज्ञात हुआ कि उनकी देह से प्राण निकल गए हैं, मानों उनके चारों ओर शून्य है। ‘शंखधर!’ बस, यही एक शब्द उस प्रशस्त शून्य में किसी पंछी की भाँति चक्कर लगा रहा था। ‘शंखधर!’ यही एक स्मृति थी, जो उस प्राण-शून्य दशा में चेतना को संस्कारों में बाँधे हुई थी।
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