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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....

४५

राजा विशालसिंह ने जिस हौसले से अहिल्या का गौना किया, वह राजाओं-रईसों में भी बहुत कम देखने में आता है। तहसीलदार साहब के घर में इतनी चीज़ों को रखने की ज़गह भी न थी। बर्तन, कपड़े शीशे के सामान, लकड़ी की अलभ्य वस्तुएँ, मेवे, मिठाइयाँ, गायें, भैसें–इनका हफ़्तों तक ताँता लगा रहा। दो हाथी और पाँच घोडे़ भी मिले, जिनके बाँधने के लिए घर में ज़गह न थी। पाँच लौंडियाँ अहिल्या के साथ आईं। यद्यपि तहसीलदार साहब ने नया मकान बनवाया था; पर वह क्या जानते थे कि एक दिन रियासत जगदीशपुर की आधी सम्पति आ पहुँचेगी? घर का कोना-कोना सामानों से भरा हुआ था। कई पड़ोसियों के मकान भी अँट उठे। इस पर लाखों रुपये नकद मिले वह अलग। तहसीलदार, साहब लाने को तो सब कुछ लाए, पर अब उन्हें देख-देख रोते और कुढ़ते थे। कोई भोगनेवाला नहीं! अगर यही सपत्ति आज से पच्चीस साल पहले मिली होती, तो उसका जीवन सफल हो जाता, ज़िन्दगी का कुछ मजा उठा लेते, अब बुढापे में इनको लेकर क्या करें? चीज़ों को बेचना अपमान की बात थी। हाँ, यार दोस्तों को जो कुछ भेंट कर सकते थे, किया। अनाज की कई गाड़ियाँ मिली थी, वह सब उन्होंने लुटा दीं। कई महीने सदाव्रत-सा चलता रहा। नौकरों को हुक्म दे दिया कि किसी आदमी को कोई चीज़ मँगनी देने से इनकार मत करो। सहालग के दिनों में रोज़ ही हाथी, घोड़े, पालकियाँ, फ़र्श आदि सामान मँगनी जाते, सारे शहर में तहसीलदार साहब की कीर्ति छा गई। बड़े-बड़े रईस उनसे मुलाकात करने लगे। नसीब जगे, तो इस तरह जगे। कहाँ रोटियाँ भी न यमस्सर होती थीं, आज द्वार पर हाथी झूमता है। सारे शहर में यही चर्चा थी।

मगर मुंशीजी के दिल पर जो कुछ बीत रही थी, वह कौन जान सकता है? दिन में बीसों ही बार चक्रधर पर बिगड़ते–नालायक! आप-तो-आप गया, अपने साथ लड़के को भी ले गया। न जाने कहाँ मारा-मारा फिरता होगा, देश का उपकार करने चला है। सच कहा है–घर की रोएँ, बन की सोएँ। घर के आदमी मरें, परवाह नहीं, दूसरों के लिए जान देने को तैयार। अब बताओ, इन  हाथी, घोड़े, मोटरों और गाड़ियों को लेकर क्या करूँ? अकेले किस-किस पर बैठूँ? बहू है, उसे रोने से फुरसत नहीं। बच्चा की माँ है, उनसे अब मारे शौक के रहा नहीं जाता। कौन बैठे? यह सामान तो मेरे जी का जंजाल हो गया। पहले बेचारे शाम-सबेरे कुछ गा-बजा लेते थे, कुछ सरूर भी ज़मा लिया करते थे, आज इन चीज़ों की देख-भाल ही में भोर हो जाता। क्षण भर भी आराम से बैठने की मुहलत न मिलती। निर्मला किसी चीज़ की ओर आँख उठाकर भी न देखतीं, मुंशीजी ही को सबकी निगरानी करनी पड़ती थी।

अहिल्या यहाँ आकर और भी पछताने लगी। वह रनिवास के विलासमय जीवन से विरक्त होकर यहाँ प्रायश्चित्त करने के इरादे से आई थी; पर वह विपत्ति उसके साथ यहाँ भी आई। वहाँ उसे घर-गृहस्थी से कोई मतलब न था, यहाँ वह विपत्ति भी सिर पड़ी। जिन वस्तुओं से उसे वहाँ ज़रा भी मोह न था, उन्हीं के खो जाने की ख़बर हो जाने पर उसे दुःख होता था। वह माया को जीतना चाहती थी, माया ने उसी को परास्त कर दिया। सम्पत्ति से गला छुड़ाना चाहती थी; पर सम्पत्ति उससे और चिमट गई थी। वहाँ कुछ देर शान्ती से बैठ सकती थी, कुछ देर हँस-बोलकर जी बहला लेती थी, किसी के ताने-मेहने न सुनने पड़ते थे, यहाँ निर्मला बाणों से छेदती और घाव पर नमक छिड़कती रहती थी। बहू के कारण वह अपने पुत्र से वंचित हुई। बहू ही के कारण पोता भी हाथ से गया। ऐसी बहू को वह पान-फूल से पूज न सकती थीं। सम्पत्ति लेकर वह क्या करे? चाटें? पुत्र और पौत्र के बदले में इस अतुल धन का क्या मूल्य था? भोजन वह अब भी अपने हाथों ही पकाती थी। अहिल्या के साथ जो महाराजिने आई थीं, उनका पकाया हुआ भोजन वह ग्रहण न कर सकती थी। अहिल्या से भी वह छूत मानती थी। इन दिनों मंगला भी आई हुई थी। उसका जी चाहता था कि यहाँ की सारी चीज़ें समेट ले जाऊँ। अहिल्या अपनी चीज़ों को तीन-तेरह न होने देना चाहती थी। इससे ननद-भावज में कभी-कभी खटपट हो जाती थी।

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