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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
बर्तनों में कई बड़े-बड़े कंडाल भी थे। एक कंडाल इतना बड़ा था कि उसमें ढाई सौ कलसे पानी आ जाता था। मंगला ने एक दिन यह कंडाल अपने घर भिजवा दिया। कई दिन बाद अहिल्या को यह ख़बर मिली, तो उसने जाकर सास से पूछा–अम्माँजी वह बड़ा कंडाल कहाँ है, दिखाई नहीं देता?
निर्मला ने कहा–बाबा, मैं नहीं जानती, कैसा कंडाल था। घर में है, तो कहाँ जा सकता है?
अहिल्या–जब घर में हो तब न?
निर्मला–घर में से कहाँ गायब हो जाएगा?
अहिल्या–घर की चीज़ घर के आदमियों के सिवा और कौन छू सकता है?
निर्मला–तो क्या इस घर में सब चोर ही बसते हैं?
अहिल्या–यह तो मैं नहीं कहती; लेकिन चीज़ का पता तो लगना ही चाहिए।
निर्मला–तुम चीज़ें लादकर ले जाओगी, तुम्हीं पता लगाती फिरो। यहाँ चीज़ों को लेकर क्या करना है? इन चीज़ें को देखकर मेरी आँखें फूटती हैं। इन्हीं के लिए तो तुमने मेरे बच्चे को बनवास दे दिया। इन्हीं के पीछे अपने बेटे से हाथ धो बैठी। तुम्हें ये चीज़ प्यारी होंगी। मुझे तो नहीं प्यारी हैं।
बात कड़वी थी, पर यथार्थ। अगर धन-मद ने अहिल्या की बुद्धि पर परदा न डाल दिया होता, तो आज उसे क्यों यह दिन देखना पड़ता? दरिद्र रहकर भी सुखी होती। मोह ने उसका सर्वनाश कर दिया। फिर भी वह मोह को गले लगाए हुए है। नैहर में उसकी आई, हुई चीज़ अपनी न थी, सब कुछ अपना होते हुए भी उसका कुछ न था। जो कुछ अधिकार था, वह पुत्र के नाते। जब पुत्र की कोई आशा न रही, तो अधिकार भी न रहा, पर यहाँ की सब चीज़ें उसी की थीं। उन पर उसका नाम खुदा हुआ था। अधिकार में स्वयं एक आनन्द है, जो उपयोगिता की परवाह नहीं करता। उन वस्तुओं को देख-देखकर उसे गर्व होता था।
लेकिन आज निर्मला के कठोर शब्दों ने उसमें ग्लानि और विवेक का संचार कर दिया। लेकिन निश्चय किया, अब इन चीज़ों के लिए कभी न बोलूँगी। अगर अम्माँजी तो किसी चीज़ का मोह नहीं है, तो मैं ही क्यों करूँ? कोई आग लगा दें, मेरी बला से।
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