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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
अब अहिल्या को रात-दिन यही धुन रहने लगी कि किसी तरह वागीश्वरी के पास चलूँ, मानों वहाँ उसके सारे दुःख दूर हो जाएँगे इधर कई महीनों से वागीश्वरी का पत्र न आया था, पर मालूम हुआ था कि वह आगरे ही में है। अहिल्या ने कई बार बुलाया था; पर वागीश्वरी ने लिखा था–मैं बड़े आराम से हूँ, मुझे अब यहीं पड़ी रहने दो। अब अहिल्या का मन वागीश्वरी के पास जाने के लिए अधीर हो उठा। वागीश्वरी भी उसी की भाँति-दुःखिनी है। सारी आशाओं एवं सारे माया-मोह से मुक्त हो चुकी है। वही उसके साथ सच्ची सहानुभूति कर सकती है, वही अपने मातृ-स्नेह से उसका क्लेश हर सकती है।
आख़िर एक दिन अहिल्या ने सास से यह चर्चा कर ही दी। निर्मला ने कुछ भी आपत्ति नहीं की। शायद वह खुश हुई कि किसी तरह यहाँ से टले। मंगला तो उसके जाने का प्रस्ताव सुनकर हर्षित हो उठी। जब वह चली जाएगी, तो घर में मंगला का राज हो जाएगा। जो चीज़ चाहेगी, उठा ले जाएगी, कोई हाथ पकड़नेवाला या टोकनेवाला न रहेगा। दो महीने भी अहिल्या वहाँ रह गई, तो मंगला अपना घर भर लेगी। ज़्यादा नहीं, तो आधी सम्पदा तो अपने घर पहुँचा ही देगी।
अहिल्या जब यात्रा की तैयारियाँ करने लगी, तो मंगला ने कहा–भाभी, तुम चली जाओगी, तो यहाँ बिलकुल अच्छा न लगेगा। वहाँ कब तक रहोगी?
अहिल्या–अभी क्या कहूँ बहिन, यह तो वहाँ जाने पर मालूम होगा।
मंगला–इतने दिनों के बाद जा रही हो, दो-तीन महीने तो रहना ही पड़ेगा। तुम चली जा रही हो, तो मैं भी चली जाऊँगी। अब तो रानी साहब से भी भेंट नहीं होती, अकेले कैसे रहा जाएगा। तुम्हीं दोनों जनों से मिलने तो आयी थी। रानी साहबा ने तो भुला ही दिया, तुम छोड़े चली जाती हो।
यह कहकर मंगला रोने लगी।
दूसरे दिन अहिल्या यहाँ से चली। अपने साथ कोई साज सामान न लिया। साथ ही लौंडियाँ चलने को तैयार थीं, पर उसने किसी को साथ न लिया। केवल एक बुड्ढे कहार को पहुँचाने के लिए ले लिया। और उसे भी आगरे पहुँचने के दूसरे ही दिन बिदा कर दिया।
आज २० साल के बाद अहिल्या ने इस घर में फिर प्रवेश किया था; पर आह! इस घर की दशा कुछ और थी। सारा घर गिर पड़ा था। न आँगन का पता था, न बैठक का। चारों ओर मलबे का ढेर ज़मा हो रहा था। उस पर मदार और धतूरे के पौधे उगे हुए थे। एक छोटी-सी कोठरी बच रही थी। वागीश्वरी उसी में रहती थी। उसकी सूरत भी उस घर के समान ही बदल गई थी। न मुँह में दाँत, न आँखों में ज्योति, सिर के बाल सन हो गए थे, कमर झुककर कमान हो गई थी। दोनों गले मिलकर खूब रोयीं। जब आँसुओं का वेग कम हुआ, तो वागीश्वरी ने कहा–बेटी, तुम अपने साथ कुछ सामान नहीं लायीं–क्या दूसरी ही गाड़ी से जाने का विचार है? इतने दिनों के बाद आयी भी, तो इस तरह! बुढ़िया को बिलकुल भूल ही गई! खंडहर में तुम्हारा जी क्यों लगेगा?
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