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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


अहिल्या–अम्माँ, महल में रहते-रहते जी ऊब गया, अब कुछ दिन इस खंडहर में ही रहूँगी और तुम्हारी सेवा करूँगी। जब से तुम्हारे घर से गयी, तब से एक दिन भी सुख नहीं पाया। तुम समझती होगी कि मैं वहाँ बड़े आनन्द से रहती हूँगी, लेकिन अम्माँ, मैंने वहाँ दुःख पाया, आनन्द के दिन तो इसी घर में बीते थे।

वागीश्वरी–लड़के का अभी कुछ पता न चला?

अहिल्या–किसी का पता न चला, अम्माँ! मैं राज्यसुख पर लट्टू हो गई थी। उसी का दंड भोग रही हूँ। राज्यसुख भोगकर तो जो कुछ मिलता है, वह देख चुकी; अब उसे छोड़कर देखूँगी कि क्या जाता है, मगर तुम्हें तो बड़ा कष्ट हो रहा है, अम्माँ?

वागीश्वरी–कैसा कष्ट बेटी? जब तक स्वामी जीते रहे, उनकी सेवा करने में सुख मानती थी। तीर्थ, व्रत, पुण्य, धर्म सब कुछ उनकी सेवा ही में था। अब वह नहीं हैं, तो उनकी मर्यादा की सेवा कर रही हूँ। आज भी उनके कितने ही भक्त मेरी मदद करने को तैयार हैं; लेकिन क्यों किसी की मदद लूँ? तुम्हारे दादाजी सदैव दूसरों की सेवा करते रहे। इसी में अपनी उम्र काट दी। तो फिर मैं किस मुँह से सहायता के लिए हाथ फैलाऊँ?

यह कहते-कहते वृद्धा का मुखमंडल गर्व से चमक उठा। उसकी आँखों में एक विचित्र स्फूर्ति झलकने लगी! अहिल्या का सिर लज्जा से झुक गया। माता, तुझे धन्य है! तू वास्तव में सती है, तू अपने ऊपर जितना गर्व करे, वह थोड़ा है।

वागीश्वरी ने फिर कहा–ख्वाज़ा महमूद ने बहुत चाहा कि मैं कुछ महीना ले लिया करूँ। मेरे मैकेवाले कई बार मुझे बुलाने आये। यह भी कहा कि महीने में कुछ ले लिया करो। भैया बड़े भारी वकील हैं; लेकिन मैंने किसी का एहसान नहीं लिया। पति की कमाई को छोड़कर और किसी की कमाई पर स्त्री का अधिकार नहीं होता। चाहे कोई मुँह से न कहे, पर मन में जरूर समझेगा कि मैं इन पर एहसान कर रहा हूँ। जब तक आँखें  थीं, सिलाई करती रही। जब से आँखें, गयीं, दलाई करती हूँ। कभी-कभी उन पर जी झुँझलाता है। जो कुछ कमाया, उड़ा दिया। तुम तो देखती ही थी। ऐसा कौन-सा दिन जाता था कि द्वार पर चार मेहमान न आ जाते हों? लेकिन फिर दिल को समझाती हूँ कि उन्होंने किसी बुरे काम में तो धन नहीं उड़ाया! जो कुछ किया, दूसरों के उपकार के लिए किया। यहाँ तक कि अपने प्राण भी दे दिये। फिर मैं क्यों पछताऊँ और रोऊँ? यश सेंत में थोड़े ही मिलता है; मगर मैं तो अपनी बातों में लग गई। चलो हाथ-मुँह धो डालो, कुछ खा-पी लो, फिर बातें करूँ।

लेकिन अहिल्या हाथ-मुँह धोने न उठी। वागीश्वरी की आदर्श पति-भक्ति देखकर उसकी आत्मा उसका तिरस्कार कर रही थी। अभागिनी! इसे पति-भक्ति कहते हैं! सारे कष्ट झेलकर स्वामी की मर्यादा का पालन कर रही है। नैहरवाले बुलाते हैं और नहीं जाती, हालाँकि इस दशा में मैके चली जाती, तो कोई बुरा न कहता। सारे कष्ट झेलती है और खुशी से झेलती है। एक तू है कि मैके की संपत्ति देखकर फूल उठी, अन्धी हो गई। राजकुमारी और पीछे चलकर राज़माता बनने की धुन में तुझे पति की परवाह ही न रही, तूने संपत्ति से सामने पति को कुछ न समझा उसकी अवहेलना की। वह तुझे अपने साथ ले जाना चाहते थे, तू न गयी, राजसुख तुझसे न छोड़ा गया! रो अपने कर्मों को।

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