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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
वागीश्वरी ने फिर कहा–अभी तक तू बैठी ही है। हाँ, लौंड़ी पानी नहीं लायी न, कैसे उठेगी! ले, मैं पानी लाये देती हूँ, हाथ-मुँह धो डाल? तब तक मैं तेरे लिए गरम रोटियाँ सेकती हूँ। देखूँ तुझे अब भाती है कि नहीं। तू मेरी रोटियों का बहुत बखान करके खाती थी।
अहिल्या ये स्नेह में सने शब्द सुनकर पुलकित हो उठी। इस ‘तू’ मैं जो सुख था; वह ‘आप’ और ‘सरकार’ में कहा? बचपन के दिन आँखों में फिर गए। एक क्षण के लिए उसे अपने सारे दुःख विस्मृत हो गए। बोली–अभी तो भूख-प्यास नहीं है अम्माँजी, बैठिए कुछ बातें कीजिए। मैं आपसे दुःख की कथा कहने के लिए व्याकुल हो रही हूँ। बताइए, मेरा उद्धार कैसे होगा?
वागीश्वरी ने गम्भीर भाव से कहा–पति-प्रेम से वंचित होकर स्त्री के उद्धार का कौन उपाय है, बेटी? पति ही स्त्री का सर्वस्व है। जिसने अपना सर्वस्त्र खो दिया, उसे सुख कैसे मिलेगा? जिसको लेकर तूने पति का त्याग किया, उसको त्याग कर ही पति को पाएगी। तू इतनी कर्तव्यभ्रष्ट कैसे हो गई, वह मेरी समझ में ही नहीं आया। यहाँ तो धन पर इतना जान न देती थी। ईश्वर ने तो तेरी परीक्षा ली और तू उससे चूक गई। जब तक धन और राज्य को मोह न छोड़ेगी, तुझे उस त्यागी पुरुष के दर्शन न होंगे?
अहिल्या–अम्माँजी, सत्य कहती हूँ, मैं शंखधर के हित का विचार करके उनके साथ न गयी।
वागीश्वरी–उस विचार में क्या तेरी भोग-लालसा न छिपी थी! खूब ध्यान करके सोच, तू इससे इनकार नहीं कर सकती!
अहिल्या ने लज्जित होकर कहा–हो सकता है, अम्माँजी, मैं इनकार नहीं कर सकती।
वागीश्वरी–संपत्ति यहाँ भी तेरा पीछा करेगी, देख लेना।
अहिल्या–अब तो उससे जी भर गया, अम्माँजी!
वागीश्वरी–अभी तो वह फिर तेरा पीछा करेगी। जो उससे भागता है, उसके पीछे दौड़ती है। मुझे शंका होती है कि कहीं तू फिर लोभ में न पड़ जाए। एक बार चूकी, तो १४ वर्ष रोना पड़ा, अब की चूकी तो बाकी उम्र ही गुज़र जाएगी!
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