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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


इस तरह एक महीना गुज़र गया और अब शंखधर को यह फ़िक्र हुई कि इन्हें किस बहाने से घर ले चलूँ। अहा, कैसे आनन्द का समय होगा, जब मैं इनके साथ घर पहुँचूँगा!

लेकिन बहुत सोचने से भी उसे कोई बहाना न मिला। तब उसने निश्चय किया कि माताजी को पत्र लिखकर यहीं क्यों न बुला लूँ? माताजी पत्र पाते ही सिर के बल दौड़ आएँगी। तब देखूँ, यह किस तरह निकलते हैं? वह पछताया कि मैंने व्यर्थ ही इतनी देर लगायी। अब तक तो अम्माँजी पहुँच गई होतीं! उसी रात को उसने अपनी माता के नाम पत्र डाल दिया। वहाँ का पता ठिकाना, रेल का स्टेशन सभी बातें स्पष्ट करके लिख दीं! अन्त में यह लिखा–आप आने में विलम्ब करेंगी, तो पछताएँगी। यह आशा छोड़ दीजिए कि मैं जगदीशपुर राज्य का स्वामी बनूँगा। पिताजी के चरणों की सेवा छोड़कर मैं राज्यसुख नहीं भोग सकता। यह निश्चय है। इन्हें यहाँ से ले जाना असम्भव है। इन्हें यदि मालूम हो जाए कि मैं इन्हें पहचानता हूँ तो आज ही अंतर्ध्यान हो जाएँ। मैंने इनको अपना परिचय दे दिया है, आप लोगों की बातें भी सुनाया करता हूँ, पर मुझे इनके मुख पर ज़रा आवेश का चिह्न नहीं दिखाई देता, भावों पर इन्होंने अधिकार प्राप्त कर लिया है। आप जल्द-से-जल्द आवें।

वह सारी रात इस कल्पना में मग्न रहा कि अम्माँजी आ जाएँगी, तो पिताजी को झुककर प्रणाम करूँगा और पूछूँगा–अब भागकर कहाँ जाइएगा? फिर हम दोनों इनका गला न छोड़ेंगे, मगर मन की सोची हुई बात कभी पूरी हुई हैं?

४७

एक महीना पूरा गुज़र गया और न अहिल्या ही आयी, न कोई दूसरा ही। शंखधर दिन भर उसकी बाँट जोहता रहता। रेल का स्टेशन वहाँ से पाँच मील पर था। रास्ता भी साफ़ था। फिर भी कोई नहीं आया। चक्रधर जब कहीं चले जाते, तो वह चुपके से स्टेशन की राह लेता और निराश लौट आता। आख़िर एक महीने के बाद तीसरे दिन उसे एक पत्र मिला, जिसे पढ़कर उसके शोक की सीमा न रही। अहिल्या ने लिखा था–मैं बड़ी अभागिनी हूँ। तुम इतनी कठिन तपस्या करके जिस देवता के दर्शन कर पाए, उसके दर्शन करने की परम अभिलाषा होने पर भी मैं हिल नहीं सकती। एक महीने से बीमार हूँ जीने की आशा नहीं। अगर तुम आ जाओ, तो तुम्हें देख लूँ, नहीं तो यह अभिलाषा भी साथ जाएगी! मैं कई महीने हुए आगरे में पड़ी हूँ। जी घबराया करता है। अगर किसी तरह स्वामीजी को ला सको, तो अन्त समय उनके चरणों के दर्शन भी कर लूँ। मैं जानती हूँ, वह न आएँगे। व्यर्थ ही उनसे आग्रह न करना, मगर तुम आने में एक क्षण का भी विलम्ब न करना।

शंखधर डाकखाने के सामने खड़ा देर तक रोता रहा। माताजी बीमार हैं। पुत्र और स्वामी के वियोग से ही उनकी यह दशा हुई। क्या वह माता को इस दशा में छोड़कर एक क्षण भी यहाँ विलम्ब कर सकता है? उसने पाँच साल तक अपना कोई समाचार न लिखकर माता के साथ जो अन्याय किया था, उसी व्यथा से अधीर हो उठा।

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