|
उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
|
320 पाठक हैं |
राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
उसका मुख उतरा हुआ देखकर चक्रधर ने पूछा–क्यों बेटा, आज उदास क्यों मालूम होते हो?
शंखधर–माताजी का पत्र आया है, वह बहुत बीमार हैं। मैं पिताजी को खोजने निकला था। वह तो न मिले, माताजी भी चली जा रही हैं। पिताजी इस समय मिल जाते, तो मैं उनसे अवश्य कहता...
चक्रधर–क्या कहते, कहो न?
शंखधर–कह देता कि...कि...आप ही माताजी के प्राण ले रहे हैं। आपका विराग और तप किस काम का, जब अपने घर के प्राणी की रक्षा नहीं कर सकते? आपके पास बड़ी-बड़ी आशाएँ लेकर आया था, पर आपने भी अनाथ पर दया न की। आपको परमात्मा ने योगबल दिया है, आप चाहते, तो पिताजी की टोह लगा देते।
चक्रधर ने गभ्मीर स्वर में कहा–बेटा, मैं योगी नहीं हूँ, पर तुम्हारे पिताजी की टोह लगा चुका हूँ। उनसे मिल भी चुका हूँ। तुम नहीं जानते; पर वे गुप्त रीति से तुम्हें देख भी चुके हैं। आह! उन्हें तुमसे जितना प्रेम है, उसकी कल्पना नहीं कर सकते। तुम्हारी माता को वह नित्य याद करते हैं, लेकिन उन्होंने अपने जीवन का जो मार्ग निश्चित कर लिया है, उसे छोड़ नहीं सकते और न स्वयं किसी के साथ जबरदस्ती कर सकते हैं तुम्हारी माताजी अपनी ही इच्छा से वहाँ रह गई थीं। वह तो उन्हें अपने साथ लाने को तैयार थे।
शंखधर–आजकल तो माताजी आगरे में हैं। वागीश्वरी देवी से मिलने आयी थीं, वहीं बीमार पड़ गईं; लेकिन आपने पिताजी से भेंट की और मुझसे कुछ न कहा। इससे तो यह प्रकट होता है कि आपको भी मुझ पर दया नहीं आती।
चक्रधर ने कुछ जवाब न दिया। ज़मीन की ओर ताकते रहे। वह अत्यन्त कठिन परीक्षा में पड़े हुए थे। बहुत दिन के बाद, अनायास ही उन्हें पुत्र का मुख देखने का सौभाग्य प्राप्त हो गया था। वे सारी भावनाएँ सारी अभिलाषाएँ, जिन्हें वह दिल से निकाल चूके थे, जाग उठी थीं और इस समय वियोग के भय से आर्तनाद कर रही थीं। वह मोह बंधन, जिसे उन्होंने बड़ी मुश्किल से ढीला कर पाये था, अब उन्हें शतगुण वेग से अपनी ओर खींच रहा था, मानों उसका हाथ उन्हें अस्थिपंजर को चीरता हुआ उनके अंतस्तल तक पहुँच गया है।
सहसा शंखधर ने अवरुद्ध कंठ से कहा–तो मैं निराश हो जाऊँ?
चक्रधर ने हृदय से निकलते उच्छ्वास को दबाते हुए कहा–नहीं बेटा, संभव है, कभी वह स्वयं पुत्र-प्रेम से विकल होकर तुम्हारे पास दौड़े जाएँ। इसका निश्चय तुम्हारे आचरण करेंगे। अगर तुम अपने जीवन में ऊँचे आदर्श का पालन कर सके, तो तुम उन्हें अवश्य खींच लोगे। यदि तुम्हारे आचरण भ्रष्ट हो गए, तो कदाचित् इस शोक में वह अपने प्राण दे दें।
|
|||||











