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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


शंखधर–आपके दर्शन मुझे फिर कब होंगे! आपका पता कैसे मिलेगा? यद्यपि मुझे पिताजी के दर्शनों का सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ; लेकिन पिता के पुत्र-प्रेम की मेरे मन में जो कल्पना थी, जिसकी तृष्णा पाँच साल तक वन-वन घुमाती रही, यह आपकी दया से पूरी हो गई। मैंने आपको पिता तुल्य ही समझा है और जीवन पर्यन्त समझता रहूँगा। यह स्नेह, यह वात्सल्य, यह अपार करुणा मुझे कभी न भूलेगी। इन चरण कमलों की भक्ति मेरे मन में सदैव बनी रहेगी। आपके दर्शनों के लिए मेरी आत्मा सदैव विकल रहेगी और माताजी के स्वस्थ होते ही मैं फिर आपकी सेवा में आऊँगा।

चक्रधर ने आर्द्र कंठ से कहा–नहीं बेटा, तुम यह कष्ट न करना। मैं स्वयं कभी-कभी तुम्हारे पास आया करूँगा? मैंने भी तुमको पुत्र तुल्य समझा है और सदैव समझता रहूँगा। मेरा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ रहेगा।

संध्या समय शंखधर अपने पिता से विदा होकर चला। चक्रधर को ऐसा मालूम हो रहा था, मानों उनका हृदय वक्ष-स्थल को तोड़कर शंखधर के साथ चला जा रहा है। जब वह आँखों से ओझल हो गया, तो उन्होंने एक लम्बी साँस ली और बालकों की भाँति बिलख-बिलखकर रोने लगे। ऐसा मालूम हुआ, मानों चारों ओर शून्य है। चला गया! वह तेज़स्वी कुमार चला गया, जिसको देखकर छाती गज भर की हो जाती थी; और जिसके जाने से अब जीवन निरर्थक, व्यर्थ जान पड़ता था!

उन्हें ऐसी भावना हुई कि फिर उस प्रतिभा-सम्पन्न युवक के दर्शन न होंगे!

४८

अहिल्या के आने की ख़बर पाकर मुहल्ले की सैकड़ों औरतें टूट पड़ीं। शहर के बड़े-बड़े घरों की स्त्रियाँ भी आ पहुँची। शाम तक ताँता लगा रहा। कुछ लोग डेपुटेशन बनाकर संस्थाओं के लिए चन्दे माँगने आ पहुँचे। अहिल्या को इन लोगों से जान बचानी मुश्किल हो गई। किस-किससे अपनी विपत्ति कहे? अपनी ग़रज के बावले अपनी कहने में मस्त रहते हैं, वह किसी की सुनते ही कब हैं? इस वक़्त अहिल्या को फटे हालों यहाँ आने पर बड़ी लज्जा आयी। वह जानती कि यहाँ यह हरबोंग मच जाएगा, तो साथ दस-बीस हज़ार के नोट लेती आती। उसे अब इस टूटे-फूटे मकान में ठहरते भी लज्जा आती थी। जब से देश ने जाना कि वह राजकुमारी है, तब से वह कहीं बाहर न गयी थी। कभी काशी रहना हुआ, कभी जगदीशपुर। दूसरे शहर में आने का यह पहला ही अवसर था। अब उसे मालूम हुआ कि धन केवल भोग की वस्तु नहीं है, उससे यश और कीर्ति भी मिलती है। भोग से तो उसे घृणा हो गई थी, लेकिन यश का स्वाद उसे पहली ही बार मिला। शाम तक उसने १५-२० हज़ार के चन्दे लिख दिये और मुंशी वज्रधर को रुपये भेजने के लिए पत्र लिख दिया। खत पहुँचने का देर थी, रुपये आ गये। फिर तो उसके द्वार पर भिक्षुकों का जमघट रहने लगा। लँगड़ों-अन्धों से लेकर जोड़ी और मोटर पर बैठनेवाले भिक्षुक भिक्षा-दान माँगने आने लगे। कहीं से किसी अनाथालय के निरीक्षण करने का निमन्त्रण आता, कहीं से टी पार्टी में सम्मिलित होने का। कुमारी सभा, बालिका विद्यालय, महिला क्लब आदि संस्थाओं ने उसे मान-पत्र दिये, और उसने ऐसे सुंदर उत्तर दिये कि उसकी योग्यता और विचार-शीलता का सिक्का बैठ गया। ‘आये थे हरिभजन को ओटन लहे कपास’ वाली कहावत हुई। तपस्या करने आयी थी, यहाँ सभ्य समाज की क्रीड़ाओं में मग्न हो गई। अपने अभीष्ट का ध्यान न रहा।

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