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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
ख्वाज़ा महमूद को भी ख़बर मिली। बेचारे आँखों से मज़बूर थे। मुश्किल से चल-फिर सकते थे! उन्हें आशा थी कि रानीजी मुझे जरूर सरफराज फरमाएँगी; लेकिन जब एक हफ्ता गुज़र गया और अहिल्या ने उन्हें सरफराज न किया, तो एक दिन तामज़ान पर बैठकर स्वयं आये और लाठी टेकते हुए द्वार पर खड़े हो गए। उनकी खबर पाते ही अहिल्या निकल आयी और बड़ी नम्रता से बोली–ख्वाज़ा साहब, मिज़ाज़ तो अच्छे हैं? मैं खुद ही हाज़िर होनेवाली थी, आपने नाहक तकलीफ़ की।
ख्वाज़ा–खुदा का शुक्र है। जिंदा हूँ। हुज़ूर तो खैरियत से रहीं?
अहिल्या–आपकी दुआ है, मगर आप मुझसे यों बातें कर रहे है, गोया मैं कुछ ओर हो गई हूँ। मैं आपकी पाली हुई वही लड़की हूँ जो आज से १५ साल पहले थी, और आपको उसी निगाह से देखती हूँ।
ख्वाज़ा साहब अहिल्या की नम्रता और शील पर मुग्ध हो गए। वल्लाह? क्या इन्कसार है, कितनी खाकसारी है! इसी को शराफ़त कहते हैं कि इनसान अपने को भूल न जाए। बोले–बेटी, तुम्हें खुदा ने यह दरज़ा अता किया; मगर तुम्हारा मिजाज वही है, वरना किसे अपने दिन याद रहते हैं! प्रभुता पाते ही लोगों की निगाहें बदल जाती हैं, किसी को पहचानते तक नहीं, ज़मीन पर पाँव तक नहीं रखतें। कसम खुदा की, मैंने जिस वक़्त तुम्हें नाली में रोते पाया था, उसी वक़्त समझ गया था कि यह किसी बड़े घर का चिराग़ है। मैं यशोदानन्दन मरहूम से भी बराबर यह बात कहता रहा। इतनी हिम्मत, इतनी दिलेरी, अपनी असमत के लिए जान पर खेल जाने का यह जोश, राजकुमारियों ही में हो सकता है। खुदा आपको हमेशा खुश रखे। आपको देखकर आँखें मसरूर हो गईं। आपकी अम्माँजान तो अच्छी तरह हैं? क्या करूँ, पड़ोस में रहता हूँ, मगर बरसों आने की नौबत नहीं आती। उनकी-सी पाकीजा सिफत खातून दुनिया में कम होंगी।
अहिल्या–आप उन्हें समझाते नहीं, क्यों इतना कष्ट झेलती हैं?
ख्वाज़ा–अरे बेटा, एक बार नहीं, हज़ार बार समझा चुका; मगर जब वह खुदा की बन्दी माने भी। कितना कहा कि मेरे पास जो कुछ है, वह तुम्हारा है! यशोदानन्दन मरहूम से मेरा बिरादराना रिश्ता है। सच पूछो तो मैं उन्हीं का बनाया हुआ हूँ। मेरी ज़ायदाद में तुम्हारा भी हिस्सा है, लेकिन मेरी बातों का मुतल्लक लिहाज़ न किया। यह तवक्कुल खुदा की देन है। आपको इस मकान में तकलीफ़ होती होगी। मेरा बँगला खाली है; मगर कोई हरज न समझो, तो उसी में क़याम करो।
वास्तव में अहिल्या को उस घर में बड़ी तकलीफ़ होती थी। रात में नींद ही न आती। आदमी अपनी आदतों को एकाएक नहीं बदल सकता। १५ साल से वह उस महल में रहने की आदी हो रही थी, जिसका सानी बनारस में न था। इस तंग, गन्दे एवं टूटे-फूटे अँधेरे मकान में, जहाँ रात भर मच्छरों की शहनाई बजती रहती थी, उसे कब आराम मिल सकता था? उसे चारों तरफ़ से बदबू आती हुई मालूम होती थी। साँस लेना मुश्किल था; पर ख्वाज़ा साहब के निमंत्रण को वह स्वीकार न कर सकी, वागीश्वरी से अलग वह वहाँ न रह सकती थी। बोली–नहीं ख्वाज़ा साहब, यहाँ मुझे कोई तकलीफ़ नहीं है। आदमी को अपने दिन न भूलने चाहिए। इसी में १६ साल रही हूँ। ज़िन्दगी में जो कुछ सुख देखा, वह इसी घर में देखा। पुराने साथी का साथ कैसे छोड़ दूँ!
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