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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


ख्वाज़ा–बाबू चक्रधर का अब तक कुछ पता न चला?

अहिल्या–इसी लिहाज़ से तो मैं बड़ी बदनसीब हूँ, ख्वाज़ा साहब! उनको गए १५ साल गुज़र गए। पाँच साल से लड़का भी गायब है। उन्हीं की तलाश में निकला हुआ है। लोग समझते होंगे कि इतनी सुखी औरत दुनिया में न होगी! और मैं अपनी किस्मत को रोती हूँ। दरादा था, कि चलकर कुछ दिनों अम्माँजी के साथ अकेली पड़ी रहूँगी, पर अमीरों की बला यहाँ भी सिर से न टली। कहिए, अब यहाँ तो आपस में दंगा-फिसाद नहीं होता?

ख्वाज़ा–जी नहीं, अभी तक तो खुदा का फ़ज़ल है, लेकिन यह देखता हूँ कि आपस वह पहले की-सी मुहब्बत नहीं है। दोनों क़ौमों में कुछ ऐसे लोग हैं, जिनकी इज़्ज़त और सरवत दोनों को लड़ाते रहने पर ही क़ायम है। बस, वह एक-न-एक शिगूफा छोड़ा करते हैं। मेरा तो यह कौल है कि हिन्दू रहो, मुसलमान रहो, खुदा के सच्चे बन्दे रहो। सारी खूबियाँ किसी ही कौम के हिस्से में नहीं आयीं। न सब मुसलमान पाकीजा हैं, न सब हिन्दू देवता हैं; इसी तरह न सभी हिन्दू काफिर हैं, न सभी मुसलमान मोमिन। जो आदमी दूसरी क़ौम से जितनी नफरत करता है, समझ लीजिए कि वह खुदा से उतनी ही दूर है। मुझे आप से कमाल हमदर्दी है; मगर चलने-फिरने से मज़बूर हूँ, वर्ना बाबू साहब जहाँ होते, वहाँ से खींच लाता।

ख्वाज़ा साहब जाने लगे, तो अहिल्या ने इसलामी यतीमखाने के लिए पाँच हज़ार रुपये दान दिये। इस दान से मुसलमानों के दिलों पर भी उसका सिक्का बैठ गया। चक्रधर की याद फिर ताजी हो गई। मुसलमान महिलाओं ने भी उसकी दानशीलता देखी।

अहिल्या को अब रोज़ ही किसी-न-किसी जलसे में जाना पड़ता, और वह बड़े शौक़ से जाती। दो ही सप्ताह में उसका कायापलट-सा हो गया। यश-लालसा ने धन की उपेक्षा का भाव उसके दिल से निकाल दिया! वास्तव में वह समारोहों में अपनी मुसीबतें भूल गईं। अच्छे-अच्छे व्याख्यान तैयार करने में वह इतनी तत्पर रहने लगी, मानों उसे नशा हो गया है। वास्तव में यह नशा ही था। यश-लालसा से बढ़कर दूसरा नशा नहीं।

वागीश्वरी पुराने विचारों की स्त्री थी। उसे अहिल्या का यों घूम-घूमकर व्याख्यान देना और रुपये लुटाना अच्छा न लगता था। एक दिन उसने कह ही डाला-क्यों री अहिल्या, तू अपनी सम्पति लुटाकर ही रहेगी?

अहिल्या ने गर्व से कहा–और धन है ही किसलिए, अम्माँजी? धन में यही बुराई है कि इससे विलासिता बढ़ती है लेकिन इसमें परोकार करने की सामर्थ्य भी है।

वागीश्वरी ने परोपकार के नाम से चिढ़कर कहा–तू जो कर रही है, यह परोपकार नहीं, यश-लालसा है। अपने पुरुष और पुत्र का उपकार तो तू कर न सकी, संसार का उपकार करने चली है!

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