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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


अहिल्या–तुम तो अम्माँजी आपे से बाहर हो जाती हो।

वागीश्वरी–अगर तू धन के पीछे अन्धी न हो जाती, तो तुझे यह दंड न भोगना पड़ता। तेरा चित्त कुछ-कुछ ठिकाने पर आ रहा था, तब तक तुझे यह नई सनक सवार हो गई। परोपकार तो तब समझती, जब तू वहीं बैठे-बैठे गुप्त रूप से चन्दें भिजवा देती। मुझे शंका हो रही है कि इस वाह-वाह से तेरा सिर न फिर जाए। धन का भूत तेरे पीछे बुरी तरह पड़ा हुआ है और अभी तेरा कुछ और अनिष्ट करेगा।

अहिल्या ने नाक सिकोड़कर कहा–जो कुछ करना था, कर चुका; अब क्या करेगा? ज़िन्दगी ही कितनी रह गई है, जिसके लिए रोऊँ?

दूसरे दिन प्रातःकाल डाकिया शंखधर का पत्र लेकर पहुँचा, जो जगदीशपुर और काशी घूमता हुआ आया था। अहिल्या पत्र पढ़ते ही उछल पड़ी और दौड़ी हुई वागीश्वरी के पास जाकर बोली–अम्माँ, देखो, लल्लू का पत्र आ गया। दोनों जने एक ही जगह हैं। मुझे बुलाया है।

वागीश्वरी–ईश्वर को धन्यवाद हो बेटी। कहाँ हैं?

अहिल्या–दक्षिण की ओर हैं, अम्माँजी! पता-ठिकाना सब लिखा हुआ हैं।

वागीश्वरी–तो बस, अब तू चली जा। चल, मैं भी तेरे साथ चलूँगी।

अहिल्या–आज पूरे पाँच साल के बाद ख़बर मिली है, अम्माँजी! मुझे आगरे आना फल गया। यह तुम्हारे आशीर्वाद का फल है, अम्माँजी।

वागीश्वरी–मैं तो उस लड़के के जीवट को बखानती हूँ कि वाप का पता लगाकर ही छोड़ा।

अहिल्या–इस आनन्द में आज उत्सव मनाना चाहिए अम्माँजी।

वागीश्वरी–उत्सव पीछे मनाना, पहले वहाँ चलने की तैयारी करो। कहीं और चले गए, तो हाथ मलकर रह जाओगी।

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