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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....

४९

गाड़ी अन्धकार को चीरती हुई चली जाती थी। सहसा शंखधर ‘हर्षपुर’ का नाम सुनकर चौंक पड़ा। वह भूल गया, मैं कहाँ जा रहा हूँ, किस काम से जा रहा हूँ, और मेरे रुक जाने से कितना अनर्थ हो जाएगा? किसी अज्ञात शक्ति ने उसे गाड़ी छोड़कर उतर आने पर मज़बूर कर दिया। उसने स्टेशन को गौर से देखा। उसे जान पड़ा, मानों उसने इसे पहले भी देखा है। वह एक क्षण तक आत्मविस्मृति की दशा में खड़ा रहा। फिर टहलता हुआ स्टेशन के बाहर चला गया।

टिकट बाबू ने पूछा–आपका टिकट तो आगरे का है?

शंखधर ने लापरवाही से कहा–कोई हरज नहीं।

वह स्टेशन से बाहर निकला, तो उस समय अन्धकार में भी वह स्थान परिचित मालूम हुआ। ऐसा जान पड़ा, मानों बहुत दिनों तक यहाँ रहा है। वह सड़क पर हो लिया और आबादी की ओर चला। ज़्यों-ज़्यों बस्ती निकट आती थी, उसके पाँव तेज़ होते थे। उसे एक विचित्र उत्साह हो रहा था, जिसका आशय व स्वयं कुछ न समझ सकता था। एकाएक उसके सामने एक विशाल भवन दिखाई दिया। भवन के सामने एक छोटा-सा बाग़ था। वह बिजली को रोशनी से जगमगा रहा था। उस दिव्य प्रकाश में भवन की शुभ्र छटा देखकर शंखधर उछल पड़ा। उसे ज्ञात हुआ, यही उसका पुराना घर है, यहीं उसका बालपन बीता है। भवन के भीतर का एक-एक कमरा उसकी आँखों में फिर गया! ऐसी इच्छा हुई कि उड़कर अन्दर चला जाऊँ। बाग़ के द्वार पर एक चौकीदार संगीन चढ़ाए खड़ा था। शंखधर को अन्दर कदम रख़ते देखकर बोला–तुम कौन हो?

शंखधर ने डाँटकर कहा–चुप रहो, महारानीजी के पास जा रहे हैं।

यह रानी कौन थी, वह क्यों उसके पास जा रहा था, और उसका रानी से कब परिचय हुआ था, यह सब शंखधर को कुछ याद न आता था। दरबान को उसने जो जवाब दिया था, वह भी अनायास ही उसके मुँह से निकल गया था। जैसे नशे में आदमी का अपनी चेतना पर कोई अधिकार नहीं रहता, उसकी वाणी, उसके अंग, उसकी कर्मेन्द्रियाँ उसके काबू से बाहर हो जाती हैं, वही दशा शंखधर की भी हो रही थी। चौकीदार उसका उत्तर सुनकर रास्ते से हट गया और शंखधर ने बाग़ में प्रवेश किया। बाग़ का एक-एक पौधा, एक-एक क्यारी, एक-एक कुंज, एक-एक मूर्ति, हौज, संगमरमर का चबूतरा उसे जाना-पहचाना-सा मालूम हो रहा था। वह निःशंक भाव से राजभवन में जा पहुँचा।

एक सेविका ने पूछा–तुम कौन हो?

शंखधर ने कहा–साधु हूँ। जाकर महारानी को सूचना दे दो।

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