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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


सेविका–महारानीजी इस समय, ‘पूजा पर हैं। उनके पास जाने का हुक्म नहीं है।’

शंखधर–क्या बहुत देर तक पूजा करती हैं?

सेविका–हाँ, कोई तीन बजे रात को पूजा से उठेंगी। उसी वक़्त नाम मात्र को पारण करेंगी और घण्टे भर आराम करके स्नान करने चली जाएँगी। फिर तीन बजे रात तक एक क्षण के लिए भी आराम न करेंगी। यही उनका जीवन है।

शंखधर–बड़ी तपस्या कर रही हैं!

सेविका–और कैसी तपस्या होगी, महाराज? न कोई शौक़ है, न श्रृंगार है, न किसी से हँसना, न बोलना। आदमियों की सूरत से कोसों भागती हैं। रात-दिन जप-तप के सिवा और कोई काम ही नहीं। जब से महाराज का स्वर्गवास हुआ है, तभी से तपस्विनी बन गई हैं। आप कहाँ से आए हैं और उनसे क्या काम है?

शंखधर–साधु-सन्तों को किसी से क्या काम? महारानी की साधु-सेवा की चर्चा सुनकर चला आया।

सेविका–आपकी आवाज़ तो मालूम होता है, कहीं सुनी है, लेकिन आपको देखा नहीं।

यह कहते-कहते वह सहसा काँप उठी। शंखधर की तेज़मयी मूर्ति में उसे उस आकृति का प्रतिबिम्ब अमानुषीय प्रकाश से दीप्त दिखाई दिया, जिसे उसने २० वर्ष पूर्व देखा था! वह सादृश्य प्रतिक्षण होता जाता था, यहाँ तक कि वह भयभीत होकर वहाँ से भागी और रानी कमला के कमरे में जाकर सहमी हुई खड़ी हो गई।

रानी कमलावती ने आग्नेत्र नेत्रों से देखकर पूछा–तू यहाँ क्या करने आई? इस समय तेरा यहाँ क्या काम है?

सेविका–महारानीजी, क्षमा कीजिए। प्राणदान मिले तो कहूँ। आँगन में एक तेजस्वी पुरुष खड़ा आपको पूछ रहा है। मैं क्या कहूँ महारानीजी, उसका कंठस्वर और आकृति हमारे महाराज से इतनी मिलती है कि मालूम होता है, वही खड़े हैं। न जाने कैसी दैवी लीला है! अगर मैंने कभी किसी का अहित चेता हो, तो मैं सौ जन्म नरक भोगू।

रानी कमला पूजा पर से उठ खड़ी हुई और गम्भीर भाव से बोली–डर मत, डर मत, उन्होंने तुझसे क्या कहा?

सेविका–सरकार मेरा तो कलेजा काँप रहा है। उन्होंने सरकार का नाम लेकर कहा कि उन्हें द्वारे आने की सूचना दे दे।
`
रानी–उनकी क्या अवस्था है?

सेविका–सरकार, अभी तो मसें भीग रही हैं।

रानी कमला देर तक विचार में मग्न खड़ी रही। क्या हो सकता हैं? क्या इस जीवन में अपने प्राणाधार के दर्शन फिर हो सकते हैं? बीस ही वर्ष तो उन्हें शरीर त्याग किए भी हुए। क्या ऐसा कभी हो सकता है?

उसकी पूर्व स्मृतियाँ जागृत हो गईं। एक पर्वत की गुफा में महेन्द्र के साथ रहना याद आया। उस समय भी वह ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे थे। उनके कितने ही अलौकिक कृत्य याद आ गए, जिनका मर्म वह अब तक न समझ सकी थी। फिर वायुयान पर उनके साथ बैठकर उड़ने की याद आई। आह! वह गीत याद आया, जो उस समय उसने गाया था। उस समय प्राणनाथ कितने प्रेमविह्वल हो रहे थे। उनकी प्रेम प्रदीप्त छवि उसके सामने आ गई। हाय! उन नेत्रों में कितनी तृष्णा थी, कितनी अतृप्त लालसा! उस अपार सुखमय अशान्ति, उस मधुर व्यथापूर्ण उल्लास को याद करके वह पुलकित हो उठी। आह! वह भीषण अन्त! उसे ऐसा जान पड़ा, वह खड़ी न रह सकेगी।

सेविका ने कातर स्वर में पूछा-–सरकार, क्या आज्ञा है?

रानी ने चौंककर कहा–चल, देखूँ तो कौन है?

वह हृदय को सँभालती हुई आँगन में आई। वहीं बिजली के उज्जवल प्रकाश में उसे शंखधर की दिव्य मूर्ति ब्रह्मचर्य के तेज से चमकती हुई खड़ी दिखाई दी, मानों उसका सौभग्य सूर्य उदित हो गया हो। क्या अब भी कोई सन्देह हो सकता था? लेकिन संस्कारों को मिटाना भी तो आसान नहीं। संसार में कितना कपट है, क्या इसका उसे काफ़ी अनुभव न था! यद्यपि उसका हृदय उन चरणों से दौड़कर लिपट जाने के लिए अधीर हो रहा था, फिर भी मन को रोककर उसने दूर ही से पूछा–महाराज, आप कौन हैं, और मुझे क्यों याद किया है?

शंखधर ने रानी के समीप जाकर कहा–क्या मुझे इतनी जल्द भूल गईं, कमला? क्या इस रूपान्तर से ही तुम्हें यह भ्रम हो रहा है? मैं वही हूँ, जिसने न जाने कितने दिन हुए, तुम्हारे हृदय में प्रेम के रूप में जन्म लिया था, और तुम्हारे प्रियतम के रूप में तुम्हारे सत् व्रत और सेवा से अमर होकर आज तक उसी अपार आनन्द की खोज में भटकता फिरता हूँ। क्या कुछ और परिचय दूँ? वह पर्वत की गुफा तुम्हें याद है? वह वायुयान पर बैठकर आकाश में भ्रमण करना याद है? आह! तुम्हारे उस स्वर्गीय संगीत की ध्वनि अभी तक कानों में गूँज रही है। प्रिये, कह नहीं सकता, कितनी बार तुम्हारे हृदय मन्दिर के द्वार पर भिक्षुक बनकर आया, लेकिन दो बार आना याद है। मैंने उसे खोलकर अन्दर जाना चाहा, पर दोनों ही बार असफल रहा। वही अतृप्त आकांक्षा मुझे फिर खींच लाई है और...

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