|
उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
|
320 पाठक हैं |
राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
रानी कमला ने उन्हें अपना वाक्य न पूरा करने दिया। वह दौड़कर उनके चरणों पर गिर पड़ी और उन्हें अपने आँसुओं से पखारने लगी। यह सौभाग्य किसको प्राप्त हुआ है? जिस पवित्र मूर्ति की वह बीस वर्ष से उपासना कर रही थी, वही उसके सम्मुख खड़ी थी। वह अपना सर्वस्व त्याग देगी; इस ऐश्वर्य को तिलांजिल दे देगी और अपने प्रियतम के साथ पर्वतों में रहेगी। वह सब कुछ झेलकर अपने स्वामी के चरणों से लगी रहेगी। इसके सिवा उसे कोई आकांक्षा, कोई इच्छा नहीं है।
लेकिन एक ही क्षण में उसे अपनी शरीरिक अवस्था की याद आ गई। उसके उन्मत्त हृदय को ठोकर-सी लगी। यौवन काल के रूप-लावण्य के लिए उसका मन लालायित हो उठा, वे काले-काले लम्बे केश, वह पुष्प के समान विकसित कपोल, वे मदभरी मतवाली आँखें, वह कोमलता, वह माधुर्य अब कहाँ? क्या इस दशा में वह अपने स्वामी की प्राणेश्वरी बन सकेगी।
सहसा शंखधर बोले–कमला, कभी तुम्हें मेरी याद आती थी?
रानी ने उसका हाथ पकड़कर–स्वामी, आज २० वर्ष से तुम्हारी उपासना कर रही हूँ। आह! आप उस समय आये हैं, जब मेरे पास प्रेम नहीं, केवल श्रद्धा और भक्ति है। आइए, मेरे हृदय-मंदिर में विराजिए।
शंखधर–ऐसा क्यों कहती हो, कमला?
कमला ने सजल नेत्रों से शंखधर की ओर देखा, पर मुँह से कुछ न बोली। शंखधर ने उसके मन का भाव ताड़कर कहा–प्रिये, मेरी दृष्टि में तुम वही हो जो आज से बीस वर्ष पहले थीं। नहीं, तुम्हारा आत्मस्वरूप उससे कहीं सुंदर, कहीं मनोहर हो गया है; लेकिन तुम्हें संतुष्ट करने के लिए मैं तुम्हारा कायाकल्प कर दूँगा। विज्ञान में इतनी विभूति है कि वह काल के चिह्नों को भी मिटा दे।
कमला ने कातर स्वर में कहा–प्राणनाथ, क्या यह सम्भव है?
शंखधर–हाँ प्रिये, प्रकृति जो कुछ कर सकती है वह सब विज्ञान के लिए संभव है। यह ब्राह्मांड एक विराट् प्रयोगशाला के सिवा और क्या है?
कमला के मनोल्लास का अनुमान कौन कर सकता है? आज बीस वर्ष के बाद उसके ओठों पर मधुर हास्य क्रीड़ा करता हुआ दिखाई दिया। दान, व्रत और तप के प्रभाव का उसे आज अनुभव हुआ। इसके साथ ही उसे अपने सौभाग्य पर भी गर्व हो उठा। यह मेरी तपस्या का फल है! मैं अपनी तपस्या से प्राणनाथ को देवलोक से खींच लाई हूँ। दूसरा कौन इतना तप कर सकता है? कौन इन्द्रिय सुखों को त्याग सकता है?
|
|||||











