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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
यह भाव मन में आया ही था कि कमला चौंक पड़ी! हाय! यह क्या हुआ? उसे ऐसा मालूम हुआ कि उसकी आँखों की ज्योंति क्षीण हो गई है। शंखधर का तेज़मय स्वरूप उसे मिटा-मिटा सा दिखाई दिया और सभी वस्तुएँ साफ़ नज़र न आती थीं, केवल शंखधर दूर-दूर होते जा रहे थे।
कमला ने घबराकर कहा–प्राणनाथ, क्या आप मुझे छोड़कर चले जा रहे हैं। हाय! इतनी जल्द?
शंखधर ने गंभीर स्वर में कहा–नहीं प्रिये, प्रेम का बंधन इतना निर्बल नहीं होता।
कमला–तो आप मुझे जाते हुए क्यों दीख़ते हैं?
शंखधर–इसका कारण अपने मन में देखो!
प्रातःकाल शंखधर ने कहा–प्रिये, मेरी प्रयोगशाला की दशा क्या है?
कमला–चलिए, आपको दिखाऊँ।
शंखधर–उस कठिन परीक्षा के लिए तैयार हो?
कमला–आपके रहते मुझे क्या भय है?
लेकिन प्रयोगशाला में पहुँचकर सहसा कमला का दिल बैठ गया। जिस सुख की लालसा उसे माया के अंधकार में लिये जाती है, क्या वह सुख स्थायी होगा? पहले ही की भाँति क्या फिर दुर्भाग्य की एक कुटिल क्रीड़ा उसे इस सुख से वंचित न कर देगी? उसे ऐसा आभास हुआ कि अनंत काल से वह सुख-लालसा के इस चक्र में पड़ी हुई यातनाएँ झेल रही है। हाय रे ईश्वर! तूने ऐसा देवतुल्य पुरुष देकर भी मेरी सुख-लालसा को तृप्त न होने दिया।
इतने में शंखधर ने कहा–प्रिये, तुम इस शिला पर लेट जाओ और आँखें बन्द कर लो।
कमला ने शिला पर बैठकर कातर स्वर में पूछा–प्राणनाथ, तब मुझे ये बातें याद रहेंगी?
शंखधर ने मुस्कुराकर कहा–सब याद रहेंगी प्रिये, इससे निश्चिंत रहो।
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