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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
कमला–मुझे यह राजपाट त्याग करना पड़ेगा।
शंखधर ने देखा, अभी तक कमला मोह में पड़ी हुई हैं। अनन्त सुख की आशा भी उसके मोह-बंधन को नहीं तोड़ सकी। दुखी होकर बोले–हाँ, कमला तुम इससे बड़े राज्य की स्वामिनी बन जाओगी। राज्यसुख में बाधक नहीं होता, यदि विलास की ओर न ले जाए।
पर कमला ने ये शब्द न सुने। शिला में प्रवाहित विद्युत शक्ति ने उसे अचेत कर दिया था। केवल उसकी आँखें खुली थीं। उनमें अब भी तृष्णा चमक रही थी।
५०
राजा विशालसिंह की हिंसा-वृत्ति किसी प्रकार शान्त न होती थी। ज़्यों-ज़्यों अपनी दशा पर उन्हें दुःख होता था, उनके अत्याचार और भी बढ़ते थे। उनके हृदय में अब सहानुभूति, प्रेम और धैर्य के लिए ज़रा भी स्थान न था। उनकी संपूर्ण वृत्तियाँ ‘हिंसा, हिंसा! ’ पुकार रही थीं। जब उन पर चारों ओर से दैवी आघात हो रहे थे, उनकी दशा करें? अगर उनका वश चलता, तो इन्द्रलोक को भी विध्वंस कर देते। देवताओं पर ऐसा आक्रमण करते कि वृत्रासुर की याद भूल जाती। स्वर्ग का रास्ता बन्द पाकर वह अपनी रियासत को ही खून के आँसू रुलाना चाहते थे। इधर कुछ दिनों से उन्होंने प्रतिकार का एक ही शस्त्र खोज निकाला था। उन्हें निस्संतान रखकर मिली हुई संतान उनकी गोद से छीनकर, दैव ने उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय किया था। दैव के शस्त्रालय में उनका दमन करने के लिए यही सबसे कठोर शस्त्र था। इसे राजा साहब उनके हाथों से छीन लेना चाहते थे। उन्होंने सातवाँ विवाह करने का निश्चय कर लिया था। राजाओं के लिए कन्याओं की क्या कमी?
ब्राह्मणों ने राशि, वर्ण और विधि मिला दी थी कि यह विवाह कभी निष्फल नहीं जा सकता, अतएव कई महीने से इस सातवें विवाह की तैयारियाँ बड़े ज़ोरों से हो रही थीं। कई राजवैद्य रात-दिन बैठे भाँति-भाँति के रस बनाते रहते। पौष्टिक औषधियाँ चारों ओर से मँगायी जा रही थीं। राजा साहब यह विवाह इतनी धूमधाम से करना चाहते थे कि देवताओं के कलेजे पर साँप लौटने लगे।
रानी मनोरमा ने इधर बहुत दिनों से घर या रियासत के किसी मामले में बोलना छोड़ दिया था। वह बोलती भी, तो सुनता कौन? उसे पाकर मानो वह सब कुछ पा गए थे। रियासत का सियाह-सफेद सब-कुछ उसी के हाथों में था; यहाँ तक कि उसके प्रेमप्रवाह में राजा साहब की संतान-लालसा भी विलीन हो गई थी। वही मनोरमा अब दूध की मक्खी बनी हुई थी। राजा साहब को उसकी सूरत से घृणा हो गई थी। मनोरमा के लिए अब यह घर नरक तुल्य था। चुपचाप सारी विपत्ति सहती थी। उसे बड़ी इच्छा होती थी कि एक बार राजा साहब के पास जाकर पूछूँ, मुझसे क्या अपराध हुआ है; पर राजा साहब उसे इसका अवसर ही न देते थे। उनके मन में एक धारणा बैठ गई थी और किसी तरह अवसर ही न देते थे। उन्हें विश्वास था कि मनोरमा ही ने रोहिणी को विष देकर मार डाला। इसका कोई प्रमाण हो या न हो; पर यह बात उनके मन में बैठ गई थी। इस हत्यारिन से वह कैसे बोलते?
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