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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
मनोरमा को आए दिन कोई-न-कोई अपमान सहना पड़ता था। उसका गर्व चूर करने के लिए रोज़ कोई-न-कोई षड्यंत्र रचा जाता था। पर वह उद्दंड प्रकृतिवाली मनोरमा अब धैर्य और शान्ति का अथाह सागर है, जिसमें वायु के हलके-हलके झोंको से कोई आन्दोलन नहीं होता। वह मुस्कुराकर सब कुछ शिरोधार्य करती जाती है। यह विकट मुस्कान उसका साथ कभी नहीं छोड़ती। इस मुस्कान में कितनी वेदना, विडम्बनाओं की कितनी अवहेलना छिपी हुई है, इसे कौन जानता है? वह मुस्कान नहीं, ‘वह भी देखा, यह भी देखा’ वाली कहावत का यथार्थ रूप है। नई रानी साहिबा के लिए सुन्दर भवन बनवाया जा रहा था। उसकी सज़ावट के लिए एक बड़े आईने की ज़रूरत थी। शायद बाज़ार में इतना बड़ा आईना न मिल सका। हुक्म हुआ–छोटी रानी के दीवानखाने का बड़ा आईना उतार लाओ। मनोरमा ने यह हुक्म सुना और मुस्कुरा दी। फिर कालीन की ज़रूरत पड़ी। फिर वही हुआ–
छोटी रानी के दीवानखाने से लाओ। मनोरमा ने मुस्कुराकर सारी कालीनें दे दीं। इसके कुछ दिनों बाद हुक्म हुआ–छोटी रानी की मोटर नए भवन में लायी जाए। मनोरमा इस मोटर को बहुत पसन्द करती थी, उसे खुद चलाती थी। यह हुक्म सुना, तो मुस्कुरा दी। मोटर चली गई।
मनोरमा के पास पहले बहुत-सी सेविकाएँ थीं। इधर घटते-घटते उनकी संख्या तीन तक पहुँच गई थी। एक दिन हुक्म हुआ कि तीन सेविकाओं में से दो नए महल में नियुक्त की जाएँ। उसके एक सप्ताह बाद वह एक भी बुला ली गई। मनोरमा के यहाँ अब कोई सेविका न रही। इस हुक्म का भी मनोरमा ने मुस्कुराकर स्वागत किया।
मगर अभी सबसे कठोर आघात बाकी था। नई रानी के लिए तो नया महल बन ही रहा था। उसकी माताजी के लिए एक दूसरे मकान की ज़रूरत पड़ी। माताजी को अपनी पुत्री का वियोग असह्य था। राजा साहब ने नए महल में उनका निवास उचित न समझा। माता के रहने से नई रानी की स्वाधीनता में विघ्न पड़ेगा, इसीलिए हुक्म हुआ कि छोटी रानी का महल खाली करा लिया जाए। रानी ने यह हुक्म सुना और मुस्कुरा दी। महल खाली करा दिया गया। जिस हिस्से में पहले महरियाँ रहती थीं, उसी को उसने अपना निवासस्थान बना लिया। द्वार पर टाट के परदे लगा दिए। यहाँ पर भी उतनी ही प्रसन्न थी, जितनी अपने महल में।
एक दिन गुरुसेवक मनोरमा से मिलने आये। राजा साहब की अप्रसन्नता का पहला वार उन्हीं पर हुआ था। वह दरबार से अलग कर दिए गए थे। वह शत्रु हो गए थे। अब फिर वह किसानों का संगठन करने लगे थे बेगार के विरुद्ध अब फिर उनकी आवाज़ उठने लगी थी। मनोरमा पर ये सब अत्याचार देख-देखकर उनकी क्रोधग्नि भड़कती रहती थी। जिस दिन उन्होंने सुना कि मनोरमा अपने महल से निकाल दी गई है, उनके क्रोध का वारापार न रहा। उनकी सारी वृत्तियाँ इस अपमान का बदला लेने के लिए तिलमिला उठीं।
मनोरमा ने उनका तमतमाया हुआ चेहरा देखा, तो काँप उठी।
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