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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
गुरुसेवक ने आते-ही-आते पूछा–तुमने महल क्यों छोड़ दिया?
मनोरमा–कोई किसी से जबरदस्ती मान करा सकता है? मुझे वही कौन-सा ऐसा बड़ा सुख था, जो महल छोड़ने का दुःख होता? मैं यहाँ भी खुश हूँ।
गुरुसेवक–मैं देख रहा हूँ, बुड्ढा दिन-दिन सठियाता जाता है। विवाह के पीछे अंधा हो गया है।
मनोरमा–भैया, आप मेरे सामने ऐसे शब्द मुँह से न निकालें। आपके पैरों पड़ती हूँ।
गुरुसेवक–तुम शब्दों को कहती हो, मैं इनकी मरम्मत करने की फ़िक्र में हूँ। ज़रा विवाह का मज़ा चख लें।
मनोरमा ने त्योरियाँ बदलकर कहा–भैया, मैं फिर कहती हूँ कि आप मेरे सामने ऐसी बातें न करें। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है। वह इस समय अपने होश में नहीं हैं। यही क्या, कोई आदमी शोक के ऐसे निर्दय आघात सहकर अपने होश में नहीं रह सकता। मैं या आप उनके मन के भावों का अनुमान नहीं कर सकते। जिस प्राणी ने चालीस वर्ष तक एक अभिलाषा को हृदय में पाला हो, उसी एक अभिलाषा के लिए उचित-अनुचित, सब कुछ किया हो और चालीस वर्ष के बाद जब उस अभिलाषा के पूरे होने के सब सामान हो गए हों, एकाएक उसके गले पर छुरी चल जाए, तो सोचिए कि उस प्राणी की क्या दशा होगी? राजा साहब ने सिर पटककर प्राण नहीं दे दिए, यही क्या कम है? कम-से-कम मैं तो इतना धैर्य न रख सकती। मुझे इस बात का दुःख है कि उनके साथ मुझे जितनी सहानुभूति होनी चाहिए, मैं नहीं कर रही हूँ।
गुरुसेवक ने गम्भीर भाव से कहा–अच्छा, प्रज़ा पर इतना ज़ुल्म क्यों हो रहा है? यह भी बेहोशी है?
मनोरमा–बेहोशी नहीं तो और क्या है? जो आदमी ६४ वर्ष की उम्र में संतान के लिए विवाह करे, वह बेहोश ही है। चाहे उसमें बेहोशी का कोई लक्षण न भी दिखाई दे।
गुरुसेवक लज्जित और निराश होकर यहाँ से चलने लगे, तो मनोरमा खड़ी हो गई और आँखों में आँसू भरकर बोली-भैया, अगर शंका की बात हो, तो मुझे बतला दो।
गुरुसेवक ने आँखें नीची करके कहा–शंका की कोई बात नहीं। शंका की कौन बात हो सकती है, भला?
मनोरमा–मेरी ओर ताक नहीं रहे हो, इससे मुझे शक होता है। देखो भैया, अगर राजा साहब पर ज़रा भी आँच आई, तो बुरा होगा। जो बात हो, साफ़-साफ़ कह दो।
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