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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
गुरुसेवक–मुझसे राजा साहब से मतलब ही क्या? अगर तुम खुश हो, तो मुझे उनसे कौन-सी दुश्मनी है? रही प्रजा। वह जाने और राजा साहब जानें। मुझसे कोई सरोकार नहीं; मगर बुरा न मानों, तो एक बात पूँछूँ। वह तो तुम्हें ठोकरें मारते हैं और तुम उनके पाँव सहलाती हो। क्या समझती हो कि तुम्हारी इस भक्ति से राजा साहब फिर तुमसे खुश हो जाएँगे?
मनोरमा ने भाई को तिरस्कार की दृष्टि से देखकर कहा–अगर ऐसा समझती हूँ, तो क्या बुराई करती हूँ। उनकी खुशी की परवाह नहीं, तो फिर किसकी खुशी की परवाह करूँगी? जो स्त्री अपने पति से दिल में कीना रखे, उसे विष खाकर प्राण दे देना चाहिए। हमारा धर्म कीना रखना नहीं, क्षमा करना है। मेरा विवाह हुए बीस वर्ष से अधिक हुए। बहुत दिनों तक मुझ पर उनकी कृपा-दृष्टि रही। अब वह मुझसे तने हुए हैं। शायद मेरी सूरत से भी उन्हें घृणा हो। लेकिन आज तक उन्होंने मुझे एक भी कठोर शब्द नहीं कहा। संसार में ऐसे कितने पुरुष हैं, जो अपनी ज़बान को इतना सँभाल सकते हों? मेरी यह दशा जो हो रही हैं, मान के कारण हो रही है। अगर मैं मान को त्यागकर उनके पास जाऊँ, तो मुझे विश्वास है कि इस समय भी मुझसे वह हँसकर बोलेंगे और जो कुछ कहूँगी, उसे स्वीकार करेंगे। क्या इन बातों को मैं कभी भूल सकती हूँ? मैं तुम्हारें पैरों पड़ती हूँ, अगर कोई शंका की बात हो तो मुझे बतला दो।
गुरुसेवक ने बगलें-झाँकते हुए कहा–मैं तो कह चुका, मुझसे इन बातों से कोई मतलब नहीं।
यह कहते हुए गुरुसेवक ने आगे कदम बढ़ाया। मगर मनोरमा ने उनका हाथ पकड़ लिया और अपनी ओर खींचती हुई बोली–तुम्हारे मुख का भाव कहे देता है कि तुम्हारे मन में कोई-न-कोई बात अवश्य है, जिसे तुम मुझसे छिपा रहे हो। जब तक मुझे न बताओगे, मैं तुम्हें जाने न दूँगी।
गुरुसेवक–नोरा! तुम नाहक जिद करती हो।
मनोरमा–अच्छी बात है, न बताइए। जाइए, अब न पूछूँगी। आज से समझ लीजिएगा कि नोरा मर गई।
गुरुसेवक ने हारकर कहा–अगर मैं कोई बात अनुमान से बता ही दूँ, तो तुम क्या कर लोगी?
मनोरमा–अगर रोक सकूँगी, तो रोकूँगी।
गुरुसेवक–उसको तुम नहीं रोक सकतीं, मनोरमा! और न मैं ही रोक सकता हूँ।
मनोरमा कुछ उत्तेजित होकर बोली–कुछ मुँह से कहिए भी तो।
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