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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
गुरुसेवक–प्रजा राजा साहब की अनीति से तंग आ गई है।
मनोरमा–यह तो मैं बहुत पहले से जानती हूँ! भारत भी तो अँगरेज़ों की अनीति से तंग आ गया है। फिर इससे क्या?
गुरुसेवक–मैं विश्वासघात नहीं कर सकता।
मनोरमा–भैया, बता दीजिए, नहीं तो पछताइएगा।
गुरुसेवक–मैं इतना नीच नहीं हूँ। बस,बस, इतना ही बता देता हूँ कि राजा साहब से कह देना, विवाह के दिन सावधान रहें।
गुरुसेवक लपककर बाहर चले गए! मनोरमा स्तम्भित-सी खड़ी रह गई, मानों हाथ के तोते उड़ गए हो। इस वाक्य का आशय उसकी समझ में न आया। हाँ, इतना समझ गई कि बारात के दिन कुछ-न-कुछ उपद्रव अवश्य होनेवाला है!
कल ही विवाह का दिन था। सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। संध्या हो गई थी। प्रातःकाल बारात यहाँ से चलेगी। ज़्यादा-सोचने-विचारने का समय नहीं था। इसी वक़्त राजा साहब को सचेत कर देना चाहिए। कल फिर अवसर हाथ से निकल जाएगा। उसने राजा साहब के पास जाने का निश्चय किया; मगर पुछवाए किससे कि राजा साहब हैं या नहीं? इस वक़्त तो वह रोज़ सैर करने जाते हैं, आज शायद सैर करने न गए हों, मगर तैयारियों में लगे होंगे!
मनोरमा उसी वक़्त राजा साहब के दीवानखाने की ओर चली। इस संकट में वह मान कैसे करती? मान करने का समय नहीं है। चार वर्ष के बाद आज उसने पति के शयनागार में प्रवेश किया। ज़गह वही थी; पर कितनी बदली हुई। पौधों के गमले सूखे पड़े थे, चिड़ियों के पिजरें खाली। द्वार पर चिक पड़ी हुई थी। राजा साहब कहीं बाहर जाने के लिए कपड़े पहने तैयार थे। मेज़ पर बैठे जल्दी-जल्दी कोई पत्र लिख रहे थे; मनोरमा को देखते ही कुरसी से चौंककर उठ बैठे और बाहर की ओर चले, मानों कोई भयंकर जन्तु सामने आ गया हो।
मनोरमा ने सामने खड़े होकर कहा–मैं आपसे एक बहुत ज़रूरी बात कहने आयी हूँ। एक क्षण के लिए ठहर जाइए।
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