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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
राजा साहब कुछ झिझककर खड़े हो गए। जिस अत्याचारी के आतंक से सारी रियासत त्राहि-त्राहि कर रही थी, जिसके भय से लोगों के रक्त सूखे जाते थे, जिसके सम्मुख जाने का साहस किसी को नहीं होता था, उसे ही देखकर दया आती थी। वह भवन, जो किसी समय आसमान से बातें करता था, इस समय पृथ्वी पर मस्तक रगड़ रहा था। यह निराशा की सजीव मूर्ति थी, दलित अभिलाषाओं की जीती-जागती तसवीर, पराजय की करुण प्रतिमा, मर्दित अभिमान का आर्तनाद। और वह मोह का उपासक विवाह करने जा रहा था। मनोरथों पर पड़ी हुई तुज़ार सिर, मूँछ और भौंहों को सम्पूर्ण रूप से ग्रस चुकी थी, जिनकी ठंडी साँसों से दाँत तक गल गए थे वही अपनी झुकी हुई कमर और काँपती हुई टाँगों से प्रणय मन्दिर की ओर दौड़ा जा रहा था। वाह रे, मोह की कुटिल क्रीड़ा!
मनोरमा ने आग्रहपूर्ण स्वर से कहा–ज़रा बैठ जाइए, मैं आपका बहुत समय न लूगी।
राजा–बैठूँगा नहीं, मुझे फुरसत नहीं हैं। जो बात कहनी है, वह कह दो, मगर मुझे ज्ञान का उपदेश मत देना।
मनोरमा–ज्ञान का उपदेश मैं भला, आपको क्या दूँ? केवल इतना ही कहती हूँ कि कल बारात में सावधान रहिएगा।
राजा–क्यों?
मनोरमा–उपद्रव हो जाने का भय है।
राजा–बस, इतना ही कहना है या कुछ और?
मनोरमा–बस इतना ही।
राजा–तो तुम जाओ, मैं उपद्रवों की परवा नहीं करता। लुटेरों का भय उसे होता है, जिसके पास सोने की गठरी हो। मेरे पास क्या है, जिसके लिए डरूँ?
एकाएक उनकी मुखाकृति कठोर हो गई। आँखों में अस्वाभाविक प्रकाश दिखाई दिया। उद्दंडता से बोले–मुझे किसी का भय नहीं है। अगर किसी ने चूँ भी किया तो रियासत में आग लगा दूँगा। खून की नदी बहा दूँगा। विशालसिंह रियासत का मालिक है, उसका गुलाम नहीं। कौन है, जो मेरे सामने खड़ा हो सके? मेरी एक-एक तेज़ निग़ाह पर शत्रुओं का पित्ता पानी कर देने के लिए काफ़ी है।
मनोरमा का हृदय करुणा से व्याकुल हो उठा। इन शब्दों में कितनी मानसिक वेदना भरी हुई थी, वे होश की बातें नहीं, बेहोशी की बाढ़ थी। आग्रह करके बोली–फिर भी सावधान रहने में तो कोई बुराई नहीं है। मैं आपके साथ रहूँगी।
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