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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


राजा ने मनोरमा को घोर सशंक नेत्रों से देखकर कहा–नहीं, नहीं; तुम मेरे साथ नहीं रह सकतीं, किसी तरह नहीं। मैं तुमको खूब जानता हूँ।

यह कहते हुए राजा साहब चले गए। मनोरमा खड़ी सोचती रह गई कि इन बातों का क्या आशय है? इन शब्दों में जो शंका और दुश्चिन्ता छिपी हुई थी, यदि इनकी गन्ध भी उसे मिल जाती, तो शायद उसका हृदय फट जाता, वह वहीं खड़ी-खड़ी चिल्लाकर रो पड़ती। उसने समझा, शायद राजा साहब को उसे अपने साथ रखने में वही संकोचमय आपत्ति है, जो प्रत्येक पुरुष को स्त्रियों से सहायता लेने में होती है। इस वक़्त लौट गई; लेकिन वह खटका उससे बराबर लगा हुआ था।

रात अधिक बीत गई थी। बाहर बारात की तैयारियाँ हो रही थीं। ऐसा शानदार जुलूस निकालने की आयोजना की जा रही थी जैसा इस नगर में कभी न निकला हो। गोरी फ़ौज थी, काली फ़ौज थी, रियासत की फ़ौज थी। फ़ौजी बैंड था, कोतल घोड़े, सजे हुए हाथी, फूलों की सँवारी हुई सवारी गाड़ियाँ, सुन्दर पालकियाँ-इतनी जमा की गई थीं कि शाम से घड़ी रात तक उनका ताँता ही न टूटे। बैंड से लेकर डफले और नृसिंहे तक सभी प्रकार के बाजे थे। सैकड़ों ही विमान सजाए गए थे और फुलवारियों की तो गिनती ही नहीं थी। सारी रात द्वार पर चहल-पहल रही और सारी रात राजा साहब सजावट का प्रबन्ध करने में व्यस्त रहे। मनोरमा कई बार उनके दीवानखाने में आई और उन्हें वहाँ न देखकर लौट गई। उसके जी में बार-बार आता था बाहर ही चलकर राजा साहब से अनुनय-विनय करूँ; लेकिन भय यही था कि कहीं वह सबके सामने बकझक न करने लगें, उसे कुछ कह न बैठें। जो अपने होश में नहीं, उसे किसकी लज्जा और किसका संकोच! आखिर, जब इस तरह जी न माना तो वह द्वार पर जाकर खड़ी हो गई। शायद राजा साहब उसे देखकर उसकी तरफ़ आएँ, लेकिन उसे देखकर भी राजा साहब उसकी ओर न आए, बल्कि और दूर निकल गए।

सारे शहर में इस जुलूस और इस विवाह का उपहास हो रहा था नौकर-चाकर तक आपस में हँसी उड़ाते थे, राजा साहब की चुटकियाँ लेते थे। अपनी धुन में मस्त राजा साहब को कुछ न सूझता था, कुछ न सुनाई देता था। सारी रात बीत गई और मनोरमा को कुछ कहने का अवसर न मिला। तब वह अपनी कोठरी में लौट आयी और ऐसा फूट-फूटकर रोयी, मानों उसका कलेजा बाहर निकल पड़ेगा। उसे बीस वर्ष पहले की बात याद आयी, जब उसने राजा से विवाह के पहले कहा था–मुझे आपसे प्रेम नहीं है, और न हो सकता है। उसने अपने मनोभावों के साथ कितना अन्याय किया था। आज वह बड़ी खुशी से राजा साहब की रक्षा के लिए अपना बलिदान कर देगी। इसे वह अपना धन्य भाग्य समझेगी। यह उस अखंड प्रेम का प्रसाद है, जिसका उसने १४ वर्ष तक आनन्द उठाया और जिसकी एक-एक बात उसके हृदय पर अंकित हो गई थी। उन अंकित चिह्नों को कौन उसके हृदय से मिटा सकता है? निष्ठुरता में इतनी शक्ति नहीं! अपमान में इतनी शक्ति नहीं! प्रेम अमर है, अमिट है।

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