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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


दूसरे दिन बारात निकलने से पहले मनोरमा फिर राजा साहब के पास जाने को तैयार हुई, लेकिन कमरे से निकली ही थी कि दो हथियारबन्द सिपाहियों ने उसे रोका।

रानी ने डाँटकर कहा–हट जाओ, नमकहरामों! मैंने ही तुम्हें नौकर रखा और तुम मुझसे गुस्ताखी करते हो?

एक सिपाही बोला–हुज़ूर के हुक्म के ताबेदार हैं, क्या करें? महाराजा साहब का हुक्म है कि हुज़ूर इस भवन से बाहर न निकलने पावें। हमारा-क्या अपराध है, सरकार?

मनोरमा–तुम्हें किसने यह आज्ञा दी है?

सिपाही–खुद महाराजा साहब ने।

मनोरमा–मैं केवल एक मिनट के लिए राजा साहब से मिलना चाहती हूँ।

सिपाही–बड़ी कड़ी ताक़ीद है, सरकार, हमारी जान न बचेगी।

मनोरमा ऐंठकर रह गई। एक दिन सारी रियासत उसके इशारे पर चलती थी। आज पहरे के सिपाही तक उसकी बात नहीं सुनते। तब और अब में कितना अंतर है।

मनोरमा ने वहीं खड़े-खड़े पूछा–बारात निकलने में कितनी देर हैं।

सिपाही–अब कुछ देर नहीं है। सब तैयारी हो चुकी हैं।

मनोरमा–राजा साहब की सवारी के साथ पहरे का कोई विशेष प्रबन्ध भी किया गया है?

सिपाही–हाँ हुज़ूर! महाराज के साथ एक सौ गोरे रहेंगे। महाराज की सवारी उन्हीं के बीच में रहेगी।

मनोरमा संतुष्ट हो गई। उसकी इच्छा पूरी हो गई। राजा साहब सावधान हो गए, किसी बात का खटका नहीं। वह अपने कमरे में लौट गयी।

चार बजते-बजते बारात निकली। जुलूस की लम्बाई दो मील से कम न थी। भाँति-भाँति के बाजे बज रहे थे, रुपये लुटाए जा रहे थे; पग-पग पर फूलों की वर्षा की जा रही थी। सारा शहर तमाशा देखने को फटा पड़ता था।

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