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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
इसी समय अहिल्या और शंखधर ने नगर में प्रवेश किया और राजभवन की ओर चले; किन्तु थोड़ी ही दूर गए थे कि बारात के जुलूस ने रास्ता रोक दिया।
जब यह मालूम हुआ कि महाराजा विशालसिंह की बारात है, तो शंखधर ने मोटर रोक दी और उस पर खड़े होकर अपना रूमाल हिलाते हुए ज़ोर से बोले–सब आदमी रुक जाएँ, कोई एक कदम भी आगे न बढे़! फ़ौरन महाराजा साहब को सूचना दो कि कुँवर शंखधर आ रहे हैं।
दम-के-दम में सारी बारात रुक गई। ‘कुँवर साहब आ गए’। यह खबर वायु के झोंके की भाँति इस सिरे से उस सिरे तक दौड़ गई। जो जहाँ था, वहीं खड़ा रह गया। फिर उनके दर्शन के लिए लोग दौड़-दौड़कर जमा होने लगे। जुलूस तितर-बितर हो गया। विशालसिंह ने यह भगदड़ देखी, तो समझे, कुछ उपद्रव हो गया। गोरों को तैयार हो जाने का हुक्म दे दिया। कुछ अँधेरा हो चला था। किसी ने राजा साहब से साफ़ तो न कहा कि कुँवर साहब आ गए, बस जिसने सुना, झंडी-झंडे, बल्लम-भाले फेंक-फाँककर भागा। राजा साहब का घबरा जाना स्वाभाविक ही थी। उपद्रव की शंका पहले ही से थी। तुरन्त ख़याल हुआ कि उपद्रव हो गया। गोरों को बन्दूके सँभालने का हुक्म दिया।
उसी क्षण शंखधर ने सामने राजा साहब को प्रणाम किया।
शंखधर को देखते ही राजा साहब घोड़े से कूद पड़े और उसे छाती से लगा लिया। आज इस शुभ मुहूर्त में, वह अभिलाषा भी पूरी हो गई, जिसके नाम को वह रो चुके थे। बार-बार कुँवर को छाती से लगाते थे, पर तृप्ति ही न होती थी। आँखों से आँसू की झड़ी लगी हुई थी। जब ज़रा चित्त शान्त हुआ तो बोले–तुम आ गए बेटा, मुझ पर बड़ी दया की। चक्रधर को लाये हो न?
शंखधर ने कहा–वह तो नहीं आये।
राजा–आएँगे, मेरा मन कहता है। मैं तो निराश हो गया था, बेटा। तुम्हारी माता भी चली गयी। तुम पहले ही चले गये, फिर मैं किसका मुँह देख-देखकर जीता? जीवन का कुछ तो आधार चाहिए। अहिल्या तभी से न जाने कहाँ घूम रही है।
शंखधर–वह तो मेरे साथ हैं।
राजा–अच्छा, वह भी आ गई। वाह, मेरे ईश्वर? सारी खुशियाँ एक ही दिन के लिए ज़मा कर रखी थीं। चलो, उसे देखकर आँखें ठंडी करूँ।
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