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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


बारात रुक गई। राजा साहब और शंखधर अहिल्या के पास आये। पिता और पुत्री का सम्मिलन बड़े आनंद का दृश्य था। कामनाओं के वे वृक्ष, जो मुद्दत हुई, निराशा-तुषार की भेंट हो चुके थे, आज लहलाते, हरी-भरी पत्तियों से लदे हुए सामने खड़े थे। आँसुओं का वेग शान्त हुआ, तो राजा साहब बोले–तुम्हें यह बारात देखकर हँसी आई होगी। सभी हँस रहे हैं; लेकिन बेटा, यह बारात नहीं है। कैसी बारात और कैसा दूल्हा! यह विक्षिप्त हृदय का उद्गार है, और कुछ नहीं। मन कहता था–जब ईश्वर को मेरी सुधि नहीं, वह मुझ पर ज़रा भी दया नहीं करते, अकारण ही मुझे सताते हैं, तो मैं क्यों उनसे डरूँ ? जब स्वामी को सेवक की फ़िक्र नहीं, तो सेवक को स्वामी की फ़िक्र क्यों होने लगी? मैंने उतना अन्याय किया, जितना मुझसे हो सका। धर्म और अधर्म, पाप और पुण्य के विचार दिल से निकाल डाले। आख़िर मेरी विजय हुई कि नहीं?

अहिल्या–लल्लू आपने लिए रानी भी लेता आया है।

राजा–सच कहना! यह तो खूब हुई। क्या वह भी साथ है?

मोटर के पिछले भाग में बहू बैठी थी। अहिल्या ने पुकारकर कहा–बहु पिताजी के चरणों के दर्शन कर लो।

बहू आयी। राजा साहब देखकर चकित हो गए। ऐसा अनुपम सौंदर्य उन्होंने किसी चित्र में भी न देखा था। बहू को गले लगाकर आशीर्वाद दिया और अहिल्या से मुस्कुराकर बोले–शंखधर तो बड़ा भाग्यवान मालूम होता है। यह देवकन्या कहाँ से उड़ा लाया?

अहिल्या–दक्षिण के एक राजा की कुमारी है। ऐसा शील स्वभाव है कि देखकर भूख-प्यास बन्द हो जाती है। आपने सच ही कहा–देवकन्या है।

राजा–तो यह मेरी बारात का जुलूस नहीं, शंखधर के विवाह का उत्सव है!

५१

कमला को जगदीशपुर में आकर ऐसा मालूम हुआ कि वह एक युग के बाद अपने घर आयी है। वहाँ की सभी चीज़ें, सभी प्राणी उसके जाने-पहचाने थे; पर अब उनमें कितना अन्तर हो गया था। उसका विशाल नाचघर बिल्कुल बेमरम्मत पड़ा हुआ था। मोर उड़ गए थे, हिरन भाग गए थे और फौवारे सूखे पड़े थे। लताएँ और गमले कब के मिट चुके थे, केवल लम्बे-लम्बे स्तंभ खड़े थे; पर कमला को नयघर के विध्वंश होने का ज़रा भी दुःख न हुआ। उसकी यह दशा देखकर उसे एक प्रकार का संतोष हुआ, मानो उसके घृणित विलास की चिंता हो। अगर वह नाचघर आज वैसी ही हरा-भरा होता, जैसा उसके समय में था, तो क्या वह उसके अंदर कदम रख सकती? कदाचित् वह वहीं गिर पड़ती। अब भी उसे ऐसा जान पड़ा कि यह उसके उसी जीवन का चित्र है। कितनी ही पुरानी बातें उसकी आँखों में फिर गईं, कितनी ही स्मृतियाँ जागृत हो गईं। भय और ग्लानि से उसके रोएँ खड़े हो गए। आह! काश! वह पिछली बातें भूल जातीं। उस विलास जीवन की याद उसके हृदय-पट से मिट जाती! उन बातों को याद रखते हुए क्या इस जीवन का आनंद उठा सकती थी? मृत्यु का भयंकर हाथ न जाने कहाँ से निकलकर उसे डराने लगा। ईश्वरीय दंड के भय से वह काँप उठी। दीनता के साथ मन में ईश्वर से प्रार्थना की–भगवान्, पापिनी मैं हूँ, मेरे पापों के लिए महेन्द्र को दंड मत देना। मैं सहस्र जीवन तक प्रायश्चित करूँगी, मुझे वैधव्य की आग में न जलाना!

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