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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
नाचघर से निकलकर देवप्रिया ने रानी मनोरमा के कमरे में प्रवेश किया। वह अनुपम छति अब मलिन पड़ गई थी। जिस केश-राशि को हाथ में लेकर एक दिन वह चकित हो गई थी, उसका अब रूपांतर हो गया था। जिन आँखों में मद, माधुर्य का प्रवाह था, अब वह सूखी पड़ी थीं। उत्कंठा की करुण प्रतिमा थी, जिसे देखकर हृदय के टुकड़े हुए जाते थे। कौन कह सकता था, वह सरला विशालसिंह के गले पड़ेगी।
मनोरमा बोली–नाचघर देखने गयी थीं। आजकल तो बेमरम्मत पड़ा हुआ है। उसकी शोभा तो रानी देवप्रिया के साथ चली गयी।
देवप्रिया ने धीरे से कहा–वहाँ आग क्यों न लग गई–यही आश्चर्य है?
मनोरमा–क्या कुछ सुन चुकी हो?
देवप्रिया–हाँ, जितना जानती हूँ, उतना ही बहुत है। और ज़्यादा नहीं जानना चाहती।
यहाँ से वह रानी रामप्रिया के पास गयी। उसे देखकर देवप्रिया की आँखें सजल हो गईं। बड़ी मुश्किल से आँसुओं को रोक सकी। आह! जिस बालिका को उसने एक दिन गोद खिलाया था, वही अब इस समय यौवन की स्मृति मात्र रह गई थी।
देवप्रिया ने वीणा की ओर देखकर कहा–आपको संगीत से बहुत प्रेम है?
रामप्रिया अनिमेष नेत्र से उसकी ओर ताक रही थी। शायद देवप्रिया की बात उसके कानों तक पहुँची ही नहीं।
देवप्रिया ने फिर कहा–मैं भी आपसे कुछ सीखूँगी।
रामप्रिया अभी तक उसकी मुख-छवि निहारने में मग्न थी। अब की भी कुछ सुन सकी।
देवप्रिया फिर बोली–आपको मेरे साथ बहुत परिश्रम न करना पड़ेगा। थोड़ा बहुत जानती भी हूँ।
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