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उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


यह कहकर उसने फिर वीणा उठा ली और यह गीत गाने लगी–

प्रभु के दर्शन कैसे पाऊँ?
बनकर सरस सुमन की लतिका, पद कमलों से लग
जाँऊ; या तेरे मन मन्दिर की हरि, प्रेम पुजारिन बन जाऊँ।
प्रभु के दर्शन कैसे पाऊँ?


आह! यही गीत था, जो रामप्रिया ने कितनी बार देवप्रिया को गाते सुना था, वही स्वर था, वही माधुर्य था, वही लोच था, वही हृदय में चुभनेवाली तान थी, रामप्रिया ने भयातुर नेत्रों से देवप्रिया की ओर देखा और मूर्च्छित हो गई। देवप्रिया को भी अपनी आँखों के सामने एक परर्दा-सा गिरता हुआ मालूम हुआ। उसकी आँखें आप-ही-आप झपकने लगीं। एक क्षण और; सारा रहस्य खुल जाएगा! कदाचित् कायाकल्प का आवरण हट जाए और फिर न जाने क्या हो? वह रामप्रिया को उसी दशा में छोड़कर इस तरह अपने भवन की ओर चली, मानो कोई उसे दौड़ा रहा हो।

मनोरमा को ज़्यों ही एक लौंडी से रामप्रिया के मूर्च्छित हो जाने की ख़बर मिली; वह तुरन्त रामप्रिया के पास आयी और घंटों की दौड़धूप के बाद कहीं रामप्रिया ने आँखें खोलीं। मनोरमा को खड़ी देखकर वह फिर सहम उठी और सशंक दृष्टि से चारों ओर देखकर उठ बैठी।

मनोरमा ने कहा–आपको एकाएक यह क्या हो गया? अभी तो बहू यहाँ बैठी थी।

रामप्रिया ने मनोरमा के कान के पास मुँह ले जाकर कहा–कुछ कहते नहीं बनता बहिन! मालूम नहीं, आँखों को धोखा हो रहा है या क्या बात है। बहू की सूरत बिलकुल देवप्रिया बहिन से मिलती है। रत्ती भर भी फ़र्क़ नहीं है।

मनोरमा–कुछ-कुछ मिलती तो है, मगर इससे क्या? एक ही सूरत के दो आदमी क्या नहीं होते?

रामप्रिया–नहीं मनोरमा, बिलकुल वही सूरत है। रंगढंग, बोलचाल सब वही है। गीत भी इसने वही गाया, जो देवप्रिया बहिन गाया करती थीं। बिलकुल यही स्वर था, यही आवाज़। अरे बहिन, तुमसे क्या कहूँ, आँखों में वही मुस्कुराहट है, तिल और मसों में भी फ़र्क़ नहीं। तुमने देवप्रिया को जवानी में नहीं देखा। मेरी आँखों में तो आज भी उनकी वह मोहिनी छवि फिर रही है। ऐसा मालूम होता है कि बहिन स्वयं कहीं से आ गई हैं। क्या रहस्य है, कह नहीं सकती; पर यह वही देवप्रिया हैं, इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं।

मनोरमा–राजा साहब ने भी रानी देवप्रिया को जवानी में देखा होगा?

रामप्रिया–हाँ देखा है, और देख लेना, वह भी यही बात कहेंगे। सूरत का मिलना और बात है, वही हो जाना और बात है। चाहे कोई माने,या न माने, मैं तो यही कहूँगी कि देवप्रिया फिर अवतार लेकर आयी है।

मनोरमा–हाँ, यह बात हो सकती है।

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