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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
रामप्रिया–सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि इसने गीत भी वही गाया, जो देवप्रिया बहिन को बहुत पसंद था। ज्योतिषियों से इस विषय में राय लेनी चाहिए। देवप्रिया को जो कुछ भोग-विलास करना था, कर चुकी। अब वह यहाँ क्या करने आयी है?
मनोरमा–आप तो ऐसी बातें कर रही हैं, मानो वह अपनी खुशी से आयी है।
रामप्रिया–यह तो होता ही है, और क्या समझती हो? आत्मा को वही जन्म मिलता है, जिसकी उसे प्रबल इच्छा होती है। मैंने कई पुस्तकों में पढ़ा है, आत्माएँ एक जन्म का अधूरा काम पूरा करने के लिए फिर उसी घर में जन्म लेती हैं। इसकी कितनी मिसालें मिलती हैं।
मनोरमा–लेकिन रानी देवप्रिया तो राजपाट स्वयं छोड़कर तीर्थ-यात्रा करने गयी थीं।
रामप्रिया–क्या हुआ बहिन, उनकी भोग-तृष्णा शांत न हुई थी। अगर वही तृष्णा उन्हें फिर लायी है, तो कुशल नहीं है।
मनोरमा–आपकी बातें सुनकर तो मुझे भी शंका होने लगी है।
इसी समय अहिल्या सामने से निकल आयी। मारे गर्व और आनन्द के उसके पाँव जमीन पर न पड़ते थे। पति की याद भी इस आनन्द-प्रवाह में विलीन हो गई थी; जैसे संगीत की ध्वनि आकाश में विलीन हो जाती है।
५२
मुंशी वज्रधर ने यह शुभ समाचार सुना, तो फौरन घोड़े पर सवार हुए और राजभवन आ पहुँचे। शंखधर उनके आने का समाचार पाकर नंगे पाँव दौड़े और उनके चरणों को स्पर्श किया। मुंशीजी ने पोते को छाती से लगा लिया और गद्गद् कंठ से बोले–यह शुभ दिन भी देखना बदा था बेटा, इसी से अभी तक जीता हूँ। यह अभिलाषा पूरी हो गई। बस, इतनी लालसा और है कि तुम्हारा राजतिलक देख लूँ! तुम्हारी दादी बैठी तुम्हारी राह देख रही हैं? क्या उन्हें भूल गए?
शंखधर ने लजाते हुए कहा–जी नहीं, शाम को जाने का इरादा था। उन्हीं के आशीर्वाद से तो मुझे पिताजी के दर्शन हुए। उन्हें कैसे भूल सकता हूँ?
मुंशीजी–तुम लल्लू को अपने साथ घसीट नहीं लाए?
शंखधर–वह अपने जीवन में जो पवित्र कार्य कर रहे हैं, उसे छोड़कर कभी न आते। मैंने अपने को ज़ाहिर भी नहीं किया, नहीं तो शायद वह मुझसे मिलना भी स्वीकार न करते।
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