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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
इसके बाद शंखधर ने अपनी यात्रा का, अपनी कठिनाइयों का और पिता से मिलने का सारा वृत्तान्त कहा।
यों बातें करते हुए मुंशीजी राजा साहब के पास जा पहुँचे। राजा साहब ने बड़े आदर से उनका अभिवादन किया और बोले–आप तो इधर का रास्ता ही भूल गए।
मुंशीजी–महाराज, अब आपका और मेरा संबंध और प्रकार का है। ज़्यादा आऊँ जाऊँ तो आप ही कहेंगे, यह अब क्या करने आते हैं, शायद कुछ लेने की नीयत से आते होंगे। कभी ज़िन्दगी में धनी नहीं रहा, पर मर्यादा की सदैव रक्षा की है।
राजा–आखिर आप दिन भर बैठे-बैठे वहाँ क्या करते हैं, दिल नहीं घबराता? (मुस्कुराकर) समधिनजी में भी तो अब आक़र्ज़ण नहीं रहा।
मुंशीजी–वाह, आप उस आक़र्ज़ण का मज़ा क्या जानेंगे? मेरा तो अनुभव है कि स्त्री-पुरुष का प्रेम-सूत्र दिन-दिन दृढ़ होता जाता है। अब तो राजकुमार का तिलक हो जाना चाहिए। आप भी कुछ दिन शांति का आनन्द उठा लें।
राजा–विचार तो मेरा भी है; लेकिन मुंशीजी, न जाने क्या बात है कि जबसे शंखधर आया है; क्यों शंका हो रही है कि इस मंगल में कोई-न-कोई विघ्न अवश्य पड़ेगा। दिल को बहुत समझाता हूँ; लेकिन न जाने क्यों यह शंका से निकलने का नाम नहीं लेती।
मुंशीजी–आप ईश्वर का नाम लेकर तिलक कीजिए। जब टूटी हुई आशाएँ पूरी हो गईं, तो अब सब कुशल ही होगा। आज मेरे यहाँ कुछ आनंदोत्सव होगा। आजकल शहर में अच्छे-अच्छे कलावन्त आए हुए हैं, सभी आएँगे। आपने कृपा की, तो मेरे सौभाग्य की बात होगी।
राजा–नहीं मुंशीजी, मुझे तो क्षमा कीजिए। मेरा चित शांत नहीं। आपसे सत्य कहता हूँ मुंशीजी, आज अगर मेरा प्राणान्त हो जाए, तो मुझसे बढ़कर सुखी प्राणी संसार में न होगा। अगर प्राण दे देने की कोई सरल तरकीब मुझे मालूम होती, तो ज़रूर दे देता। शोक की पराकाष्ठा देख ली। आनन्द की पराकाष्ठा भी देख ली। अब और कुछ देखने की आकांक्षा नहीं है। डरता हूँ; कहीं पलड़ा फिर न दूसरी ओर झुक जाए।
मुंशीजी देर तक बैठे राजा साहब को तस्क़ीन देते रहे; फिर सब महिलाओं को अपने यहाँ आने का निमंत्रण देकर और शंखधर को गले लगाकर वह घोड़े पर सवार हो गए। इस निर्द्वन्द्व जीव ने चिन्ताओं को कभी अपने पास नहीं फटकने दिया। धन की इच्छा थी, ऐश्वर्य की इच्छा थी; पर उनपर जान न देते थे। संचय करना तो उन्होंने सीखा ही न था। थोड़ा मिला तब भी अभाव रहा; बहुत मिला तब भी अभाव रहा। अभाव से जीवन पर्यन्त उनका गला न छूटा। एक समय था, जब स्वादिष्ट भोजनों को तरसते थे। अब दिल खोलकर दान देने को तरसते हैं। क्या पाऊँ और क्या दे दूँ? बस, फ़िक्र थी तो इतनी ही। कमर झुक गई थी, आँखों से सूझता भी कम था; लेकिन मज़लिस नित्य जमती थी, हँसी-दिल्लगी करने में कभी न चूकते थे। दिल में कभी किसी से कीना नहीं रखा और न कभी किसी की बुराई चेती।
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