|
उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
|
320 पाठक हैं |
राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
राजा–यह तो बहुत दिनों से जानता हूँ। पर इससे चित्त को शान्ति नहीं होती! अब मुझे मालूम हो रहा है कि संसार में मन लगाना ही सारे दुःखों का मूल है। जगदीशपुर राज्य को भोगना ही मेरे जीवन का लक्ष्य था। मैंने अपने जीवन में जो कुछ किया, इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए। अपने जीवन पर कभी एक क्षण के लिए भी विचार नहीं किया। जब राज्य न था, तब अवश्य कुछ दिनों के लिए सेवा के भाव मन में जागृत हुए थे–वह भी बाबू चक्रधर के सत्संग से। राज्य मिलते ही मेरा कायापलट हो गया। फिर कभी आत्मचिन्तन की नौबत न आई। शंखधर को पाकर मैं निहाल हो गया। मेरे जीवन में ज्योति-सी आ गई, मैं सब कुछ पा गया, पर अब की जब से शंखधर लौटा है, मुझे उसके विषय में भयंकर शंका हो रही है, आपने मेरे भाई साहब को देखा था?
मुंशीजी–जी नहीं, उन दिनों तो मैं यहाँ से बाहर नौकर था। अजी, तब इल्म की क़दर थी। मिडिल पास करते ही सरकारी नौकरी मिल गई थी। स्कूल में कोई लड़का टक्कर का न था। अध्यापकों को भी मेरे बुद्धि पर आश्चर्य होता था। बड़े पंडितजी कहा करते थे, यह लड़का एक दिन ओहदे पर पहुँचेगा। उनकी भविष्यवाणी उस दिन पूरी हुई, जब मैं तहसीलदारी पर पहुँचा।
राजा–भाई साहब की सूरत आज तक मेरी आँखों में फिर रही है। यह देखिए उनकी तस्वीर है।
राजा साहब ने एक फोटो निकालकर मुंशीजी को दिखाया। मुंशीजी उसे देखते ही बोले–यह तो शंखधर की तसवीर है।
राजा–नहीं साहब, यह मेरे बड़े भाई का फ़ोटो है। शंखधर ने तो अभी तक तसवीर ही नहीं खिंचवायी। न जाने तसवीर खिंचवाने से उसे क्यों चिढ़ है!
मुंशीजी–मैं इसे कैसे मान लूँ? तसवीर साफ़ शंखधर की है।
राजा–तो मालूम हो गया कि मेरी आँखें धोखा नहीं खा रही थीं।
मुंशीजी–जी हाँ, यक़ीन मानिए। तब तो बड़ी विचित्र बात है।
राजा–अब आपसे क्या अर्ज करूँ? मुझे बड़ी शंका हो रही है। न रात को नींद आती है। दिन को बैठे चौंक पड़ता हूँ। प्राणियों की सूरतें कभी इतनी नहीं मिलतीं। भाई साहब ने ही फिर मेरे घर में जन्म लिया है, इसमें मुझे बिलकुल शंका नहीं रही। ईश्वर ही जाने, क्यों उन्होंने कृपा की है, अगर शंखधर का बाल भी बाँका हुआ, तो मेरे प्राण न बचेंगे।
मुंशीजी–ईश्वर चाहेंगे तो सब कुशल होगी। घबराने की कोई बात नहीं। कभी-कभी ऐसा होता है।
|
|||||











