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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
राजा–अगर ईश्वर चाहते कि कुशल हो, तो समस्या ही क्यों आगे आती? उन्हें कुछ-न-कुछ अनिष्ट करना है। मेरी शंका निर्मूल नहीं है मुंशीजी! बहू की सूरत भी देवप्रिया से मिल रही है। रामप्रिया तो बहू को देखकर मूर्च्छित हो गई थी। वह कहती थी, देवप्रिया ही ने अवतार लिया है। भाई और भावज का फिर इस घर में अवतार लेना क्या अकारण ही है? भगवान् अगर तुम्हें फिर वही लीला दिखानी हो, तो मुझे संसार से उठा लो।
मुंशीजी ने अब की कुछ चिंतित होकर कहा–यह तो वास्तव में बड़ी विचित्र बात है!
राजा–विचित्र नहीं है मुंशीजी, इस रियासत का सर्वनाश होनेवाला है! रानी देवप्रिया ने अगर जन्म लिया है, तो वह कभी सधवा नहीं रह सकती। उसे न जाने कितने दिनों तक अपने पूर्व कर्मों का प्रायश्चित करना पड़ेगा। दैव ने मुझे दंड देने ही के लिए मेरे पूर्व कर्मों के फलस्वरूप यह विधान किया है; पर आप देख लीजिएगा, मैं अपने को उसके हाथों की कठपुतली न बनाऊँगा; अगर मैंने बुरे कर्म किये हैं, तो मुझे चाहे जो दंड दो, मैं उसे सहर्ष स्वीकार करूँगा। मुझे अंधा कर दो, भिक्षुक बना दो, मेरा एक-एक अंग गल-गलकर गिरे, मैं दाने-दाने को मोहताज हो जाऊँ। ये सारे ही दंड मुझे मंज़ूर है, लेकिन शंखधर का सिर दुखे, यह मैं नहीं सहन कर सकता। इसके पहले मैं अपनी जान दे दूँगा। विधाता के हाथ की कठपुतली न बनूँगा।
मुंशीजी–आपने किसी पंडित से इस विषय में पूछ-ताछ नहीं की।
राजा–जी नहीं, किसी से नहीं। जो बात प्रत्यक्ष देख रहा हूँ, उसे किसी से क्या पूछूँ? कोई अनुष्ठान, कोई प्रायश्चित इस संकट को नहीं टाल सकता। उसके रूप की कल्पना करके मेरी आँखों में अँधेरा छा जाता है। पंडित लोग अपने स्वार्थ के लिए तरह-तरह के अनुष्ठानों से क्या विधि का विधान पलटा जा सकता है? मैं अपने को इस धोखे में नहीं डाल सकता मुंशीजी! मैंने जीवन पर्यन्त उसकी उपासना की है। कर्म-अकर्म का एक क्षण भी विचार नहीं किया। उसका मुझे यह उपहार मिल रहा है! लेकिन मैं उसे दिखा दूँगा कि वह मुझे अपने विनोद का खिलौना नहीं बना सकती। मैं उसे कुचल दूँगा, जैसे कोई जहरीले साँप को कुचल डालता है। अपना सर्वनाश अपनी आँखों देखने ही में दुःख है। मैं उस पिशाचिनी को यह अवसर न दूँगा कि वह मुझे रुलाकर आप हँसे। मैं संसार के सबसे सुखी प्राणियों में हूँ। इसी दशा में हूँ और इसी दशा में संसार से विदा हो जाऊँगा। मेरे बाद मेरा निर्माण किया हुआ भवन रहेगा या गिर पड़ेगा, इसकी मुझे चिन्ता नहीं। अपनी आँखों से अपना सर्वनाश न देखूँगा। मुझे आश्चर्य हो रहा है कि इस स्थिति में भी आप कैसे संगीत का आनन्द उठा सकते हैं?
मुंशीजी ने गम्भीर भाव से कहा–मैं अपनी ज़िन्दगी में कभी नहीं रोया। ईश्वर ने जिस दशा में रखा, उसी में प्रसन्न रहा। फ़ाके भी किए हैं और आज ईश्वर की दया से पेट भर भोजन भी करता हूँ, पर रहा एक ही रस। न साथ कुछ लाया हूँ, न ले जाऊँगा। व्यर्थ क्यों रोऊँ?
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