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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
राजा–आप ईश्वर को दयालु समझते हैं? ईश्वर दयालु नहीं है।
मुंशीजी–मैं ऐसा नहीं समझता।
राजा–नहीं, वह परले सिरे का कपटी व निर्दय जीव है, जिसे अपने ही रचे हुए प्राणियों को सताने में आनन्द मिलता है, जो अपने ही बालकों के बनाए हुए घरौंदे रौंदता फिरता है। आप उसे दयालु कहें, संसार उसे दयालु कहे, मैं तो नहीं कह सकता। अगर मेरे पास शक्ति होती, तो मैं उसका विधान उलट-पलट देता। उसमें संसार के रचने की शक्ति है, किन्तु उसे चलाने की नहीं!
राजा साहब उठ खड़े हुए और चलते-चलते गम्भीर भाव से बोले–जो बात पूछने आया था, वह तो भूल ही गया। आपने साधु-संतों की बहुत सेवा की है। मरने के बाद जीव को किसी बात का दुःख तो नहीं होता?
मुंशी–सुना तो यही है कि होता है और उससे अधिक होता है, जितना जीवन में।
राजा–झूठी बात है, बिलकुल झूठी। विश्वास नहीं आता। उस लोक के दुःख-सुख और ही प्रकार के होंगे। मैं तो समझता हूँ, किसी बात की याद न रहती होगी। सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर–ये सब विद्वानों के गोरख-धन्धे हैं। उनमें न पड़ूँगा। अपने को ईश्वर की दया और भय के धोखे में न डालूँगा। मेरे बाद जो कुछ होना है, वह तो होगा ही, आपसे इतना ही कहना है कि अहिल्या को ढाढ़स दीजिएगा। मनोरमा की ओर से मैं निश्चिन्त हूँ। वह सभी दशाओं में सँभल सकती है। अहिल्या उस वज्रपात को न सह सकेगी।
मुंशीजी ने भयभीत होकर राजा साहब का हाथ पकड़ लिया और सजल नेत्र हो कर बोले–आप इतने निराश क्यों होते हैं? ईश्वर पर भरोसा कीजिए सब कुशल होगी।
राजा–क्या करूँ, मेरा हृदय आपका-सा नहीं है। शंखखर का मुँह देखकर मेरा खून ठंडा हो जाता है। वह मेरा नाती नहीं शत्रु है। इससे कहीं अच्छा था कि निस्संतान रहता। मुंशीजी, आज मुझे ऐसा मालूम हो रहा है कि निर्धन होकर मैं इससे कहीं सुखी रहता।
राजा साहब द्वार ओर चले। मुंशीजी भी उनके साथ मोटर तक आये। शंका के मारे मुँह से शब्द न निकलता था। दीन भाव से राजा साहब की ओर देख रहे थे, मानो प्राण-दान माँग रहे हों।
राजा साहब ने मोटर पर बैठकर कहा–अब तकलीफ़ न कीजिए। जो बात कही है, उसे ध्यान रखिएगा।
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