लोगों की राय

उपन्यास >> कायाकल्प

कायाकल्प

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :778
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8516

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

320 पाठक हैं

राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....


मुंशीजी मूर्तिवत् खड़े रहे। मोटर चली गयी।

५५

शंखधर राजकुमार होकर भी तपस्वी है। विलास की किसी भी वस्तु से उसे प्रेम नहीं। दूसरों से वह बहुत प्रसन्न होकर बातें करता है। अहिल्या और मनोरमा के पास वह घंटों बैठा गप-शप किया करता है। दादा और दादी के समीप जाकर तो उसकी हँसी की पिटारी-सी खुल जाती है; लेकिन सैर-शिकार से कोसों भागता है। एकांत में बैठा हुआ वह नित्य गहरे विचारों में मग्न रहता है। उसके जी में बार-बार आता है कि पिताजी के पास चला जाऊँ; पर घरवालों के दुःख का विचार करके जाने की हिम्मत नहीं पड़ती। जब उसके पिता ने सेवाव्रत ले रखा है, तो वह किस हृदय से राजसुख भोगे? नरम-नरम तकिए उसके हृदय में काँटे के समान चुभते हैं, स्वादिष्ट भोजन उसे ज़हर की तरह लगता है।

पर सबसे विचित्र बात यह है कि वह कमला से भागता रहता है। युवती देवप्रिया अब वह रानी कमला नहीं है, जो हर्षपुर में तप और व्रत में मग्न रहती थी। वे सभी कामनाएँ, जो रमणी के हृदय में लहरें मारा करती हैं, उदित हो गई हैं। वह नित्य नए रूप बदलकर शंखधर के पास आती है; पर ठीक उसी समय शंखधर को या तो कोई ज़रूरी काम बाहर ले जाता है,या वह कोई धार्मिक प्रश्न उठा देता है। रात को भी शंखधर कुछ-न-कुछ पढ़ता-लिख़ता रहता है। कभी-कभी सारी रात पढ़ने में कट जाती है। देवप्रिया उसकी राह देखती-देखती सो जाती है। विपत्ति तो यह है कि देवप्रिया को पूर्वजन्म की सभी बातें याद हैं, वायुयान का दृश्य भी याद है; पर वह सोचती है, एक बार ऐसा हुआ, तो क्या बार-बार होगा? उसने अपना वैधव्य कितने संयम से व्यतीत किया था। पूर्व-कर्मों का प्रायश्चित क्या इतने पर भी पूरा नहीं हुआ?

प्रकृति माधुर्य में डूबी हुई है। आधी रात का समय है। चारों तरफ़ चाँदनी छिटकी हुई है। वृक्षों के नीचे कैसा जाल बिछा हुआ है! क्या पक्षी हृदय को फँवाने के लिए? नदियों पर कैसा सुन्दर जाल है! क्या मीन हृदय को तड़पाने के लिए? ये जाल किसने फैला रखे हैं?

देवप्रिया ने आज अपने आभूषण उतार दिये हैं, केश खोल दिये हैं और वियोगिनी के रूप में पति से प्रेम की भिक्षा माँगने जा रही है। आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई। आईना चमक उठा। देवप्रिया विजय गर्व से मुस्कुरायी। कमरे के बाहर निकली।

सहसा उसके अन्तःकरण में कहीं से आवाज़ आयी, ‘सर्वनाश! ’ देवप्रिया के पाँव रुक गए। देह शिथिल पड़ गई। उसने भीत दृष्टि से इधर-उधर देखा। फिर आगे बढ़ी।

उसी समय वायु बड़े वेग से चली। कमरे में कोई चीज़ ‘खट-खट! ’ करती हुई नीचे गिर पड़ी। देवप्रिया ने कमरे मे जाकर देखा, शंखधर का तैल चित्र संगमरमर की भूमि पर गिरकर चूर-चूर हो गया था। देवप्रिया के अन्तःकरण में फिर वही आवाज़ आयी–सर्वनाश! उसके रोएँ खड़े हो गए। पुष्प के समान कोमल शरीर मुरझा गया। वह एक क्षण तक खड़ी रही। फिर आगे बढ़ी।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book