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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
चक्रधर बोले–नहीं भाई, खंज़री न दूँगा। यह खँज़री उस युवक की है, जो कई दिनों तक मेरे पास रहा था। दूसरे की चीज़ कैसे दे दूँ?
गाँव के बहुत से आदमी ज़मा हो गए। चक्रधर विदा हुए। कई आदमी मील भर तक उनके साथ आये।
लेकिन प्रातःकाल लोग मंदिर पर पूजा करने आये, तो देखा कि बाबा भगवानदास चबूतरे पर झाड़ू लगा रहे हैं।
एक आदमी बोला–हम कहते थे, महाराज न जाइए, लेकिन आपने न माना। आख़िर हमारी भक्ति खींच लायी न? अब इसी गाँव में आपको कुटी बनानी पड़ेगी।
चक्रधर ने सकुचाते हुए कहा–अभी यहाँ कुछ दिन और अन्न-जल है, भाई! सचमुच इस गाँव की मुहब्बत नहीं छोड़ती।
चक्रधर ने मन में निश्चय किया, अब शंखधर को देखने का इरादा कभी न करूँगा। वह अपने घर पहुँच गया। सम्भव है, उसका तिलक भी हो गया हो। मेरी याद भी उसे न आती होगी। मैं व्यर्थ ही उसके लिए इतना चिंतित हूँ। पुत्र सभी के होते हैं, पर उसके पीछे कोई इतना अंधा नहीं हो जाता कि और सब काम छोड़कर बस उसी के नाम रोता रहे।
फिर सोचा–एक बार देख आने में हरज़ ही क्या है? कोई मुझे बाँध तो रखेगा नहीं। जब उस वक़्त कोई न रोक सका, तो आज कौन रोकेगा? ज़रा देखूँ, किस ढंग से राज करता है। मेरे उपदेशों का कुछ फल हुआ या पड़ गया उसी चक्कर में? धुन का पक्का तो ज़रूर है। कर्मचारियों के हाथ की कठपुतली तो शायद न बने, मगर कुछ कहा नहीं जा सकता। मानवीय चरित्र इतना जटिल है कि बुरे-से-बुरा आदमी देवता हो जाता है, और अच्छे-से-अच्छा आदमी भी पशु। मुझे देखकर झेंपेगा तो क्या! मैं यों उसके सम्मुख जाऊँ ही क्यों? दूर ही से देखकर चला आऊँगा। रंग-ढंग तो दो-चार आदमियों से बातें करते ही मालूम हो जाएगा।
यह सोचते-सोचते चक्रधर सो गए। रात को उन्हें एक भयंकर स्वप्न दिखाई दिया। क्या देखते हैं कि शंखधर एक नदी के किनारे उनके साथ बैठा हुआ है। सहसा दूर से एक नाव आती हुई दिखाई दी। उसमें से मन्नासिंह उतर पड़ा। उसने हँसकर कहा–बाबूजी, यही राजकुमार हैं न? मैं बहुत दिनों से खोज रहा हूँ। राजा साहब इन्हें बुला रहे हैं। शंखधर उठकर मन्नासिहं के साथ चला। दोनों नाव पर बैठे। मन्नासिंह डाँड चलाने लगा। चक्रधर किनारे ही खड़े रह गए। नाव थोड़ी ही दूर जाकर चक्कर खाने लगी। शंखधर ने दोनों हाथ उठाकर उन्हें बुलाया! वह दौड़े; पर इतने में नाव डूब गई। एक क्षण में फिर नाव ऊपर आ गई। मन्नासिंह पूर्ववत् डाँड चला रहा था, पर शंखधर का पता न था।
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