|
उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
|
320 पाठक हैं |
राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
चक्रधर ज़ोर से एक चीख मारकर जग पड़े! उनका हृदय धक-धक कर रहा था। उनके मुख से शब्द निकल पड़े–ईश्वर! यह स्वप्न है या होनेवाली बात? अब उनसे वहाँ न रहा गया। उसी वक़्त उठ बैठे, बकुचा लिया और चल खड़े हुए।
चाँदनी छिटकी हुई थी। चारों ओर सन्नाटा था। पर्वत श्रेणियाँ अभिलाषाओं की समाधियों-सी मालूम होती थीं। वृक्षों के समूह श्मशान से उठनेवाले धुएँ की तरह नज़र आते थे। चक्रधर कदम बढ़ाते हुए पथरीली पगडंडियों पर चले जाते थे।
चक्रधर की इस वक़्त वह मानसिक दशा हो गई थी, जब अपने ही को अपनी ख़बर नहीं रहती। वह सारी रात पथरीले पथ पर चलते रहे। प्रातःकाल रेलवे स्टेशन मिला। गाड़ी आयी, उस पर जा बैठे। गाड़ी में कौन लोग बैठे थे; उन्हें देख-देखकर लोग उनसे क्या प्रश्न करते थे, उनका वह क्या उत्तर देते थे, रास्ते में कौन-कौन से स्टेशन मिले, कब दोपहर हुई, कब संध्या हुई, इन बातों का उन्हें ज़रा भी ज्ञान न हुआ। पर वह कर वही रहे थे, जो उन्हें करना चाहिए था। किसी की बातों का ऊटपटांग जवाब न देते थे, जिन गाड़ियों पर बैठना न चाहिए था, उन पर न बैठते थे, जिन स्टेशनों पर उतरना न चाहिए था, वहाँ न उतरते थे। अभ्यास बहुधा चेतना का स्थान ले लिया करता है।
तीसरे दिन प्रातःकाल गाड़ी काशी जा पहुँची। ज्यों ही गाड़ी गंगा के पुल पर पहुँची, चक्रधर की चेतना जाग उठी! सँभल बैठे। गंगा के बाएँ किनारे पर हरियाली छायी हुई थी। दूसरी ओर काशी का विशाल नगर ऊँची अट्टालिकाओं और गगनचुम्बी मन्दिर-कलसों से सुशोभित सूर्य के स्निग्ध प्रकाश से चमकता हुआ खड़ा था। मध्य में गंगा मंद गति से अनंत की ओर दौड़ी चली जा रही थीं, मानो अभिमान से अटल नगर और उच्छृंखलता से झूमती हुई हरियाली से कह रही हों–अनंत जीवन अनंत प्रवाह में है। आज बहुत दिनों के बाद यह चिरपरिचित दृश्य देकर चक्रधर का हृदय उछल पड़ा। भक्ति का उद्गार मन में उठा। एक क्षण के लिए वह अपनी सारी चिन्ताएँ भूल गए, गंगा-स्नान की प्रबल इच्छा हुई। इसे वह किसी तरह न रोक सके।
स्टेशन पर कई पुराने मित्रों से उनकी भेंट हो गई। उनकी सूरतें कितनी बदल गई थीं। वे चक्रधर को देखकर चौंके, कुशल पूछी और जल्दी से चले गये। चक्रधर ने मन में कहा–कितने रूखे लोग हैं कि किसी को बातें करने की फुरसत नहीं।
वह एक ताँगे पर बैठकर स्नान करने चले। थोड़ी ही दूर गये थे कि गुरुसेवक सिंह मोटर पर सामने से आते दिखाई दिये। चक्रधर ने ताँगेवाले को रोक दिया। गुरुसेवक ने भी मोटर रोकी और पूछा–क्या अभी चले आ रहे हैं?
चक्रधर–जी हाँ, चला ही आता हूँ?
|
|||||











