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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
गुरुसेवक ने मोटर आगे बढ़ा दी। चक्रधर को इनसे इतनी रुखाई की आशा न थी। चित्त खिन्न हो उठा।
दशाश्वमेघ घाट पहुँचकर ताँगे से उतरे। इसी घाट पर वह पहले भी स्नान किया करते थे। सभी पंडे उन्हें जानते थे; पर आज किसी ने भी प्रसन्न चित्त से उनका स्वागत नहीं किया। ऐसा जान पड़ता था कि उन लोगों को उनसे बातें करते जब्र हो रहा है। किसी ने न पूछा–कहाँ-कहाँ घूमे? क्या करते रहे?
स्नान करके चक्रधर फिर ताँगे पर आ बैठे और राजभवन की ओर चले। ज़्यों-ज़्यों भवन निकट आता था, उनका आशंकित हृदय अस्थिर होता जाता था।
ताँगा सिंहद्वार पर पहुँचा। वह राज्य का पताका, जो मस्तक ऊँचा किए लहराती रहती थी, झुकी हुई थी। चक्रधर का दिल बैठ गया। इतने ज़ोर से धड़कन होने लगी मानो हथौड़े की चोट पड़ रही हो।
ताँगा देखते ही एक बूढ़ा दरबान आकर खड़ा हो गया, चक्रधर को ध्यान से देखा और भीतर की ओर दौड़ा। एक क्षण के अन्दर हाहाकार मच गया। चक्रधर को मालूम हुआ कि वह किसी भयंकर जन्तु के उदर में पड़े हुए, तड़फड़ा रहे हैं।
किससे पूछें, क्या विपत्ति आयी है? कोई निकट नहीं आता। सब दूर सिर झुकाए खड़े हैं। वह कौन लाठी टेकता हुआ चला आता है? अरे! यह तो मुंशी वज्रधर हैं। चक्रधर ताँगे से उतरे और दौड़कर पिता के चरणों पर गिर पड़े।
मुंशीजी ने तिरस्कार के भाव से कहा–दो-चार दिन पहले न आते बना कि लड़के का मुँह तो देख लेते। अब आये हो, जबकि सर्वनाश हो गया! क्या बैठे यही मना रहे थे?
चक्रधर रोए नहीं, गम्भीर एवं सुदृढ़ भाव से बोले–ईश्वर की इच्छा। मुझे किसी ने एक पत्र तक न लिखा। बीमारी क्या थी?
मुंशी–अजी, सिर तक नहीं दुखा, बीमारी होना किसे कहते हैं? बस, होनहार! तक़दीर! रात को भोजन करके बैठे एक पुस्तक पढ़ रहे थे। बहू से बातें करते हुए स्वर्ग की राह ली। किसी हकीम-वैद्य की अक्ल नहीं काम करती कि क्या हो गया था। जो सुनता है, दाँतों तले उँगली दबाकर रह जाता है। बेचारे राजा साहब भी इस शोक में चल बसे। तुमने उसे भुला ही दिया था; पर उसे तुम्हारे नाम की रट लगी हुई थी बेचारे के दिल में कैसे-कैसे अरमान थे! हम और तुम क्या रोएँगे, रोती है प्रजा। इतने ही दिनों में सारी रियासत उस पर जान देने लगी थी। इस दुनिया में क्या कोई रहे! जी भर गया। अब तो जब तक जीना है, तब तक रोना है। ईश्वर बड़ा निर्दयी है।
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