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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
चक्रधर ने लम्बी साँस खींचकर कहा–मेरे कर्मों का फल है। ईश्वर को दोष न दीजिए।
मुंशी–तुमने ऐसे कर्म किए होंगे; मैंने नहीं किए। मुझे क्यों इतनी चोट लगाई? मैं भी अब तक ईश्वर को दयालु समझता था; लेकिन अब वह श्रद्धा नहीं रही। गुणानुवाद करके सारी उम्र बीत गई। उसका यह फल! उस पर कहते हो, ईश्वर को दोष न दीजिए। अपने कल्याण ही के लिए तो ईश्वर का भजन किया है, या किसी की जीभ खुजलाती है? कसम ले लो, जो आज से कभी एक पद भी गाऊँ। तोड़ आया सितार, सारंगी, सरोद, पखावज; सब पटककर तोड़ डाले। ऐसे निर्दयी की महिमा कौन गाए और क्यों? मर्दे आदमी तुम्हारी आँखों में आँसू भी नहीं निकलते? खड़े ताक रहे हो। मैं कहता हूँ–रो लो, नहीं तो कलेजे में नासूर पड़ जाएगा। बड़े-बड़े त्यागी देखे हैं; लेकिन जो पेट भरकर रोया नहीं, उसे फिर हँसते नहीं देखा। आओ, अन्दर चलो। बहू ने दीवार से सिर पटक दिया पट्टी बाँधे पड़ी हुई है। तुम्हें देखकर उसे धीरज हो जायेगा! मैं डरता हूँ कि वहाँ जाकर कहीं तुम भी रो न पड़ो, नहीं तो उसके प्राण ही निकल जाएँगे।
यह कहकर मुंशीजी ने उनका हाथ पकड़ लिया और अंतःपुर में ले गये। अहिल्या को उनके आने की ख़बर मिल गई थी। उठना चाहती थी; पर उठने की शक्ति न थी। चक्रधर ने सामने आकर कहा–अहिल्या ठ्ठअहिल्या ने फिर चेष्टा की। बरसों की चिन्ता, कई दिनों के शोक और उपवास एवं बहुत-सा रक्त निकल जाने के कारण शरीर जीर्ण हो गया था। करवट घूमकर दोनों हाथ पति के चरणों की ओर बढ़ाए; पर वह चरणों को स्पर्श न कर सकी, हाथ फैले रह गए, और एक क्षण में भूमि पर लटक गए। चक्रधर ने घबराकर उसके मुख की ओर देखा। निराशा मुरझाकर रह गई थी। नेत्रों में करुण याचना भरी हुई थी।
चक्रधर ने रुँधे हुए स्वर में कहा–अहिल्या, मैं आ गया, अब कहीं न जाऊँगा! ईश्वर से कहता हूँ, कहीं न जाऊँगा। हाय ईश्वर! क्या तू मुझे यही दिखाने के लिए यहाँ लाया था?
अहिल्या ने एक बार तृषित, दीन एवं तिरस्कारमय नेत्रों से पति की ओर देखा। आँखें सदैव के लिए बन्द हो गईं।
उसी वक़्त मनोरमा आकर द्वार पर खड़ी हो गई। चक्रधर ने आँसुओं को रोकते हुए कहा–रानीजी, ज़रा आकर इन्हें चारपाई से उतरवा दीजिए।
मनोरमा ने अन्दर आकर अहिल्या का मुख देखा और रोकर बोली–आपके दर्शन बदे थे, नहीं तो प्राण तो कब के निकल चुके थे। दुखिया का कोई भी अरमान पूरा न हुआ।
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