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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
उपसंहार
यह कहते-कहते मनोरमा की आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई! कई साल बीत गए हैं। मुंशी वज्रधर नहीं रहे। घोड़े की सवारी का उन्हें बड़ा शौक़ था। नर घोड़े ही पर सवार होते थे। बग्घी, मोटर, पालकी इन सभी को वह जनानी सवारी कहते थे! एक दिन जगदीशपुर से बहुत रात गए लौट रहे थे। रास्ते में एक नाला पड़ता था। नाले में उतरने के लिए रास्ता भी बना हुआ था; लेकिन मुंशीजी नाले में उतरकर पार करना अपमान की बात समझते थे। घोड़े ने जस्त मारी, उस पार निकल भी गया, पर उसके पाँव गड्ढे में पड़ गए। गिर पड़ा, मुंशीजी भी गिरे और फिर न उठे। हँस-खेलकर जीवन काट दिया। निर्मला भी पति का वियोग सहने के लिए बहुत दिन जीवित न रही उसकी अन्तिम अभिलाषा, कि चक्रधर फिर विवाह कर लें, पूरी न हो सकी।
देवप्रिया फिर जगदीशपुर पर राज्य कर रही है। हाँ, उसका नाम बदल गया है। विलासिनी देवप्रिया अब तपस्विनी देवप्रिया है। उसका भविष्य अब अंधकार मय नहीं है। प्रभात की आशामयी किरणें उसके जीवन मार्ग को आलोकित कर रही हैं। रानी मनोरमा नए भवन में रहती हैं। उसने कितनी ही चिड़ियाँ पाल रखी हैं। उन्हीं की देख-रेख में अब वह अपने दिन काटती है। पक्षियों के कलरव में वह अपनी मनोव्यथा को विलीन कर देना चाहती है। उसके शयनागार में सोने के चौखट में जड़ा हुआ एक चित्र दीवार से लटका हुआ है, जिसमें दीवान हरिसेवक के मुँह से निकले हुए ये शब्द अंकित हैं–
‘लौंगी को देखो! ’
आज से कई साल पहले, जब राजा साहब जीवित थे, मनोरमा को उसके पिता ने यही अंतिम उपदेश दिया था। उसी दिन से यह उपदेश उसका जीवन-मंत्र बना हुआ है।
चक्रधर बहुत दिन घर पर न रहे। माता-पिता के बाद वह घर, घर ही न रहा। फिर दक्षिण की ओर सिधारे! लेकिन अब वह केवल सेवा-कार्य ही नहीं करते; उन्हें पक्षियों से बहुत प्रेम हो गया है। विचित्र पक्षियों की उन्हें नित्य खोज रहती है। भक्तजन उनका यह पक्षी-प्रेम देखकर उन्हें प्रसन्न करने के लिए नाना प्रकार के पक्षी लाते रहते हैं। इन पक्षियों के अलग-अलग नाम हैं। अलग-अलग उनके भोजन की व्यवस्था है। उन्हें पढ़ाने, घुमाने व चुगने का समय नियत है।
साँझ हो गई थी। मनोरमा बाग में टहल रही थी। सहसा हौज़ के पास एक बहुत ही सुंदर पिंज़रा दिखाई दिया। उसमें एक पहाड़ी मैना बैठी हुई थी। रानीजी को आश्चर्य हुआ। यहाँ पिंज़रा कहाँ से आया? उसके पास कई चिड़ियाँ थीं, जिन्हें उसने सैकड़ों रुपये ख़र्च करके खरीदा था; पर ऐसा सुंदर एक भी न थी। रंग पीला था, सिर पर लाल दाग़ था, चोंच इतनी प्यारी कि चूम लेने को जी चाहता था। मनोरमा समीप गई, तो मैना बोली–‘नोरा! हमें भूल गईं? तुम्हारा पुराना सेवक हूँ।’
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