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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
मनोरमा के आश्चर्य का पारावार न रहा। उसे कुछ भय-सा लगा। इसे मेरा नाम किसने पढ़ाया? किसकी चिड़िया है? यहाँ कैसे आई? इसका स्वामी अवश्य कोई होगा? आता होगा, देखूँ कौन है?
मनोरमा बड़ी देर तक खड़ी उस आदमी का इंतज़ार करती रही। जब अब भी कोई न आया, तो उसने माली को बुलाकर पूछा–यह पिंज़रा बाग़ में कौन लाया?
माली ने कहा–पहचानता तो नहीं हुज़ूर; पर हैं कोई भले आदमी। मुझसे देर तक रियासत की बातें पूछते रहे। पिंज़रा रखकर गए कि और चिड़ियाँ लेता आऊँ; पर लौटकर न आए।
रानी–आज फिर आएँगे?
माली–हाँ हुज़ूर, कह तो गए हैं।
रानी–आएँ तो मुझे ख़बर देना।
माली–बहुत अच्छा, सरकार।
रानी–सूरत कैसी है, बता सकता है?
माली–बड़ी-बड़ी आँखें हैं हुज़ूर; लम्बे आदमी हैं। एक-एक बाल पक रहा है।
रानी ने उत्सुक्ता से कहा–आएँ तो मुझे ज़रूर बुला लेना।
रानी पिंज़रा लिए चली आई। रात भर वही मैना उसके ध्यान में बसी रही उसकी बातें कानों में गूँजती रहीं।
कौन कह सकता है, यह संकेत पाकर उसका मन कहाँ-कहाँ विचर रहा था। सारी रात वह मधुर स्मृतियों का सुखद स्वप्न देखने में मग्न रही। प्रातःकाल उसके मन आया, चलकर देखूँ, वह आदमी आया है या नहीं। वह भवन से निकली; पर फिर लौट गयी।
थोड़ी ही देर में फिर वही इच्छा हुई। वह आदमी कौन है, क्या यह बात उससे छुपी हुई थी? वह बाग़ के फाटक तक आई; पर वहीं से लौट गई। उसका हृदय हवा के पर लगाकर उस मनुष्य के पास पहुँच जाना चाहता था; पर आह! कैसे जाए?
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