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उपन्यास >> कायाकल्प कायाकल्पप्रेमचन्द
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राजकुमार और रानी देवप्रिया का कायाकल्प....
चार बजे वह ऊपर के कमरे में जा बैठी और उस आदमी की राह देखने लगी। वहाँ से माली का मकान साफ़ दिखाई देता था। बैठे-बैठे बड़ी देर हो गई। अँधेरा होने लगा। रानी ने एक गहरी साँस ली। शायद अब न आएँगे।
सहसा उसने देखा, एक आदमी दो पिंज़रे दोनों हाथों से लटकाए बाग़ में आया। मनोरमा का हृदय बाँसों उछलने लगा। सहस्र घोड़ों की शक्ति वाला इंजन उसे उस आदमी की ओर खींचता हुआ जान पड़ा। वह बैठी न रह सकी। दोनों हाथों से हृदय को थामे, साँस बन्द किए मनोवेग से आंदोलित वह खड़ी रही। उसने सोचा, माली अभी मुझे बुलाने आता होगा; पर माली न आया और वह आदमी वहीं पिंज़रा रखकर चला गया। मनोरमा अब वहाँ न रह सकी। हाय! वह चले जा रहे हैं। तब वह जमीन पर लेटकर फफ़क-फफ़क कर रोने लगी।
सहसा माली ने आकर कहा–सरकार वह आदमी दो पिंज़रे रख गया है और कह गया है कि फिर कभी और चिड़ियाँ लेकर आऊँगा मनोरमा ने कठोर स्वर में पूछा–तूने मुझसे उसी वक़्त क्यों नहीं कहा?
माली पिंज़रे को उसके सामने ज़मीन पर रखता हुआ बोला–सरकार, मैं उसी वक़्त आ रहा था; पर उसी आदमी ने मना किया। कहने लगा, अभी सरकार को क्यों बुलाओगे? मैं फिर कभी और चिड़ियाँ लाकर आप ही उनसे मिलूँगा। रानी कुछ न बोली। पिंज़रे में बन्द दोनों चिड़ियों को सजल नेत्रों से देखने लगी।
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